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कठोर साध��ा व निष्ठामय जीवन

भोजनगर में श्री देवचन्द्र जी राधा-वल्लभ मत के अनुयायी हरिदास जी के सान्निध्य में रहकर सेवा ध्यान करने लगे । हरिदास जी गोपीभाव से राधा-कृष्ण की भक्ति में लगे रहते थे ।

हरिदास जी ने उन्हें दीक्षा भी दी । श्री देवचन्द्र जी का मन घर-परिवार में नहीं लगता था । वे मात्र तीन घण्टे (रात्रि १२-३) ही घर पर रहते । शेष सारा समय हरिदास जी की सेवा, मंदिर की परिक्रमा तथा चर्चा सत्संग में व्यतीत करते थे । वे प्रतिदिन प्रातः तीन बजे ही गुप्त रूप से मंदिर की परिक्रमा करना प्रारम्भ कर देते थे तथा शेष दिन प्रत्यक्ष सेवा करते थे । इस प्रकार कई वर्ष व्यतीत हो गये ।

एक दिन हरिदास जी को पता चल गया कि देवचन्द्र जी प्रातः तीन बजे मंदिर की परिक्रमा करते हैं । हरिदास जी का मकान एवं मंदिर दोनों ही संयुक्त रूप में थे । मंदिर की परिक्रमा करने पर उनके मकान की भी परिक्रमा होती थी । इतनी बड़ी सेवा का बोझ सम्भालना उन्हें कठिन प्रतीत होने लगा । निदान, उन्होंने यह निर्णय लिया कि उनके पास जो श्री कृष्ण की दो मूर्तियां बाल मुकुन्द तथा बांके बिहारी की हैं, उनमें से एक श्री बाल मुकुन्द की मूर्ति देवचन्द्र जी को सौंप देंगे, ताकि वे घर पर ही अपनी सेवा पूजा कर सकें ।

जब श्री हरिदास जी प्रातः काल सेवा हेतु मंदिर में पहुँचे तो बाल मुकुन्द की मूर्ति नहीं दिखी । बहुत खोजने पर भी जब उसका कुछ पता नहीं चला तो हरिदास जी ने प्रतिज्ञा कर ली कि जब तक मूर्ति नहीं मिलती तब तक वे भोजन नहीं करेंगे । पूरा दिन बीत गया । मध्य रात्रि में श्री बाल मुकुन्द जी ने हरिदास जी को साक्षात् दर्शन दिया । उन्होंने बताया कि मूर्ति इसलिए अदृष्य हो गयी कि हरिदास जी कहीं उन्हें श्री देवचन्द्र जी को न सौंप दें । श्री बाल मुकुन्द जी ने यह भेद खोला कि ब्रज लीला में राधा जी के तन में बैठकर देवचन्द्र जी की आत्मा ने लीला की थी तथा इनकी ही कृपा से उन्हें गोलोक में मुक्ति मिली थी । अतः वह किसी भी प्रकार से श्री देवचन्द्र जी से सेवा नहीं करवा सकते थे । इसलिए हरिदास जी देवचन्द्र जी को रास बिहारी जी के वस्त्रों की सेवा दे दें । इस वार्ता के बाद श्री बाल मुकुन्द जी अदृश्य हो गये तथा उनकी मूर्ति अपने निश्चित् स्थान पर दिखने लगी ।

श्री देवचन्द्र जी के आगमन पर हरिदास जी ने, उनके चरणों पर गिरकर, उनसे सेवा करवाने के लिए क्षमा मांगी और सारा प्रसंग सुनाकर आभार प्रकट किया कि देवचन्द्र जी की कृपा से उन्हें पहली बार बाल मुकुन्द जी का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ ।

इसके पश्चात् श्री देवचन्द्र जी ने बांके बिहारी जी के वस्त्रों की सेवा अपने घर पर पधरायी तथा अटूट निष्ठा के साथ सेवा और चितवनि करने लगे । कुछ दिनों तक चितवनि करने के बाद एक दिन उनका ध्यान अखण्ड ब्रज में पहुँच गया और उन्होंने श्री कृष्ण के दर्शन किये । उस समय उनकी आयु लगभग २५-२६ वर्ष थी तथा यह दूसरी बार उन्हें परब्रह्म ने भेष बदलकर साक्षात्कार दिया था ।

तत्पश्चात्, हरिदास जी की प्रेरणा से, श्री देवचन्द्र जी नवतनपुरी (जामनगर) आकर कान्ह जी भट्ट से श्रीमद्भागवत् की कथा सुनने लगे ।

 

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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