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विजयाभिनन्द बुद्ध
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श्री विजयाभिनन्द बुद्ध जी की महिमा

भविष्योत्तर पुराण के अन्तर्गत बुद्ध गीता का वर्णन है, जिसमें ब्रह्मा जी ने नारद जी को श्री विजयाभिनन्द बुद्ध जी की पहचान व महिमा का वर्णन किया है । बुद्धगीता में वर्णित कुछ श्लोक निम्न हैं-

हे नारद ! मोहरूपी नींद में ही ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव उत्पन्न हुए हैं । नींद के अपने कारण में लीन हो जाने पर ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा सभी प्राणी भी उसी में लीन हो जाते हैं ।।८।।

यह अक्षर ब्रह्म उस मोह रूपी नींद से परे हैं । इस कथन का वर्णन पहले किया जा चुका है । हे पुत्र ! किन्तु बुद्ध जी तो उस अक्षर ब्रह्म से भी परे हैं ।।९।।

श्री विजयाभिनन्द बुद्ध जी सबकी बुद्धि को सुन्दर करने वाले हैं अर्थात् सबको जागृत बुद्धि प्रदान करने वाले हैं । ये परब्रह्म के ही स्वरूप हैं । ये अत्यन्त तेजोमय हैं एवं अक्षर ब्रह्म से भी परे के साक्षात् परम पुरुष हैं । ये सभी प्राणियों का परम कल्याण करने वाले हैं । इस कथन में कोई भी संशय नहीं है ।।१६।।

यह श्री बुद्ध जी ही अक्षरातीत पुरुष कहे जाते हैं । ये अत्यन्त तेजोमय हैं तथा मूल स्वरूप परब्रह्म के निज स्वरूप कहे जाते हैं ।।१७।।

जागृत बुद्धि की शक्ति को अपने अन्दर धारण करने वाले बुद्ध जी शुद्ध ज्ञानस्वरूप कहे जाते हैं । ये सबको जागृत बुद्धि देने वाले हैं, इसलिए ये ब्रह्मज्ञान का ज्योतिर्मय स्वरूप कहे जाते हैं ।।१८।।

जिसके हृदय में बुद्ध जी का स्वरूप विराजमान होता है, उसके मन में दुःख या चिन्ता नहीं होती है, और उसे लौकिक सुख का पूर्ण ज्ञान भी नहीं रहता और न उसे अपने शरीर का ही वास्तविक ज्ञान रहता है अर्थात् वह सुख-दुःख, हर्ष-शोक एवं शरीर के मोह जनित द्वन्दों से परे हो जाता है ।।२१।।

स्वयं आदि नारायण भी जिन बुद्ध जी से निराकार से परे का ज्ञान प्राप्त करने वाले हैं और ऐसा करके वे भी योगमाया के ब्रह्माण्ड में जागृत एवं अखण्ड स्वरूप वाले हो जायेंगे । इस कथन में संशय जैसी कोई भी बात करने योग्य नहीं है ।।२४।।

वे श्री बुद्ध जी ही मोक्ष के स्वरूप हैं अर्थात् सभी प्राणियों को अखण्ड मुक्ति देने वाले हैं । इस भवसागर को मथकर वे पांच रत्नों शिव, सनकादि, कबीर, शुकदेव और विष्णु भगवान (अक्षर ब्रह्म की पंचवासनाएँ) को निकालकर स्वयं तेजोमय परब्रह्म के रूप में अपनी महिमा से व्यापक होंगे ।।२५।।

श्री बुद्ध जी का वह स्वरूप परमधाम की सखियों (आत्माओं) के साथ जागनी रास की लीला करेगा । वे सखियां श्रुतियों का स्वरूप हैं, अर्थात् जिस प्रकार वेद की ऋचायें वेद का स्वरूप होती हैं, उसी प्रकार परमधाम की आत्मायें अक्षरातीत का ही स्वरूप होती हैं । ब्रह्ममुनियों के रूप में प्रकट होने वाली वे सखियां तुम्हारे द्वारा हमेशा ही जानने योग्य हैं ।।३८।।

श्रुतियों के समान पवित्र स्वरूप वाली वे सखियां, अक्षरातीत के साथ क्रीड़ा करती हुई उनके बुद्धमय स्वरूप में स्वयं व्याप्त हैं तथा बुद्ध जी भी उनके अन्दर व्यापक हैं । इस कथन में कोई भी संशय नहीं हो सकता ।।३९।।

श्री बुद्ध जी का स्वरूप विशुद्ध गौर वर्ण का होगा, अर्थात् उनके यश में किसी भी प्रकार की कालिमा नहीं होगी । वे सभी प्रकार के भेदभाव से रहित, समदर्शी एवं अद्वितीय परब्रह्म के स्वरूप होंगे । वे समान अंगों वाले, अर्थात् ऊँच-नीच की भावना से रहित और मायावी विकारों से पूर्णतया रहित होंगे । वे कल्प के प्रारम्भ में ही प्रकट होने वाले हैं ।।४०।।

उस समय एकमात्र बुद्ध जी ही वेद के समान सम्पूर्ण ज्ञान के भण्डार होंगे तथा स्वयं वे ही आनन्दमय परब्रह्म के रूप में जाहिर होंगे ।।४१।।

हे पुत्र ! श्री बुद्ध जी की कृपा से पशु और अपशु, चर और अचर, तथा मोह (नींद, निराकार) से उत्पन्न होने वाले वे जो भी प्राणी हैं, वे सभी अखण्ड धाम (योगमाया) में अखण्ड स्वरूप वाले हो जायेंगे ।।४८।।

सत्व, रज तथा तम इन तीनों गुणों तथा इनके कारण होने वाले कर्मों से रहित, सबसे अतीत, अक्षर ब्रह्म के भी स्वामी, शान्ति स्वरूप उन श्री बुद्ध जी को प्रणाम है ।।५५।।

श्री बुद्ध जी के विषय में न तो सांख्य दर्शन की ही गति है, न वेदान्त की और न मीमांसा दर्शन की, अर्थात् ये शास्त्र उस अक्षरातीत पूर्ण ब्रह्म की स्पष्ट पहचान नहीं करा सकते हैं । जिनके स्वरूप में किसी भी प्रकार से माया की गम नहीं है, सबके आश्रय स्वरूप ऐसे बुद्ध जी को प्रणाम है ।।५६।।

अत्यधिक सुन्दर एवं शान्ति स्वरूप, ज्ञानमयी दीप्ति से भरपूर, तेजोमय स्वरूप वाले, लौकिक कर्मकाण्डों का पालन न करने वाले, सुख स्वरूप, संसार को ब्रह्मज्ञान की आभा से भरपूर करने वाले उन श्री बुद्ध जी को प्रणाम है ।।५७।।

सम्पूर्ण जगत के स्वामी, अपनी आत्माओं के प्रति पतिपने के सम्बन्ध को निभाने वाले, जागृत बुद्धि रूपी घोड़े पर विराजमान, उन परब्रह्म स्वरूप श्री बुद्ध जी को प्रणाम है ।।५८।।

 

लिंग पुराण में शिव-पार्वती संवाद के रूप में बुद्ध स्तोत्र का वर्णन है । उसमें वर्णित कुछ श्लोक निम्न हैं-

अक्षर ब्रह्म की जागृत बुद्धि से युक्त उन श्री विजयाभिनन्द निष्कलंक बुद्ध जी को प्रणाम है । सभी आत्माओं के धाम स्वरूप तथा शान्ति के स्वरूप श्री बुद्ध जी को प्रणाम है ।।१।।

माया से मोहित होने वाले सभी प्राणी उस परब्रह्म को निराकार कहते हैं । जिस परमधाम का ज्ञान कलियुग में प्रकट होगा, उसके विषय में वे नहीं जानते हैं ।।६।।

इसलिए हे देवी ! तुम्हारे सामने मैंने जिस कलियुग का वर्णन किया है, वह धन्य है । श्री बुद्ध जी के ज्ञान से यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही योगमाया के ब्रह्माण्ड में अखण्ड होने वाला है ।।१२।।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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