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  निजानन्द दर्शन  »  जीव और आत्मा में भेद 

जीव और आत्मा में भेद

सृष्टि के प्रारम्भ से आज तक कोई भी जीव और आत्मा का भेद स्पष्ट नहीं कर पाया था । वैदिक साहित्य में भी दोनो को पुल्लिंग तथा समानार्थक ही माना गया है । श्री प्राणनाथ जी की वाणी (तारतम) के द्वारा इस भेद का निरूपण हुआ ।

भी वासना जीव का बेवरा एता , ज्यों सूरज दृष्टें रात ।

जीव का अंग सुपन का , वासना अंग साख्यात ।। (श्रीमुख वाणी- क. हि. २३/६१)

जीव और आत्मा में इतना अन्तर है जितना रात और सूर्य में है । जीव की उत्पत्ति स्वप्न के स्वरूप (आदि नारायण) से है, जबकि आत्मा साक्षात् परब्रह्म का अखण्ड और अनादि अंग है ।

भी बेवरा वासना जीव का , याके जुदे जुदे हैं ठाम ।

जीव का घर है नींद में , वासना घर श्री धाम ।। (श्रीमुख वाणी- क. हि. २३/६२)

आत्मा और जीव में यह भी अन्तर है कि इनके मूल घर अलग-अलग हैं । जीव का मूल घर नींद (निराकार) में है तथा आत्मा का मूल घर परब्रह्म का अनादि एवं अखण्ड परमधाम है ।

ए सबे तुम समझियो , वासना जीव विगत ।

झूठा जीव नींद न उलंघे , नींद उलंघे वासना सत ।। (श्रीमुख वाणी- क. हि. २४/२��)

आत्मा और जीव में यह भी अन्तर है कि झूठा जीव स्वप्न से उत्पन्न होने के कारण नींद (निराकार) को पार नहीं कर पाता । जबकि आत्मायें निराकार एवं अक्षरधाम को भी पार करके अपने मूल घर अखण्ड परमधाम में पहुँच जाती हैं ।

श्रुति के कथनानुसार नारायण ही जीवों के साक्षात् परब्रह्म हैं और जीव उनका प्रतिभास रूप हैं। जीव स्वतन्त्र नही हैं, अपितु पराधीन हैं । वे मोह, अविद्या और अहंकार से ही बने हैं और जन्म-मरण एवं सुख-दुःख (कर्मफल भोग) के चक्र में ही फँसे रहते हैं । जीव माता के गर्भ में प्रवेश करता है । मनुष्य शरीर के अतिरिक्त जीव अनेक योनियों में भी शरीर (जीवन) धारण करता है । नारायण का स्वप्न टूटते ही अर्थात् महाप्रलय होते ही जीव उनमें समा जाते हैं ।

आत्मा अनादि और अखण्ड है । वह कभी गर्भ में नहीं आती, अपितु जन्म के पश्चात् ही शरीर में प्रवेश करती है । आत्मा कभी भी मनुष्य तन के अतिरिक्त किसी अन्य योनि में शरीर धारण नहीं करती । परब्रह्म का स्वरूप होने से वह प्रेम व आनन्द में मग्न रहती हैं । वे एक क्षण के लिए भी उनसे अलग नहीं हो सकती ।

जीव उस अविनाशी ब्रह्म को माता, पिता, स्वामी, सखा, आदि अनेक भावों का रूप मानकर स्तुति करता है । जबकि आत्मा उस परब्रह्म की अभिन्न अंग होने के कारण अनन्य प्रेम भाव के मार्ग पर चलती हैं । आत्मा के इस अलौकिक प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए वेदों में कहीं-कहीं आत्मा का परब्रह्म के लिए पत्नी (स्त्री) भाव वर्णित किया गया है-

मै इस पाप-दहन करने के सामर्थ्य वाली, अज्ञान की विरोधिनी, अत्यधिक बलवती ब्रह्मविद्या को खोदती हूँ या प्राप्त करती हूँ, जिससे सौत- अविद्या या माया का विनाश किया जाता है और जिससे आत्मा अपने एकमात्र पति परब्रह्म को प्राप्त कर लेती है । (ऋग्वेद १०/१४५/२ ।। अथर्ववेद ३/१८/१)  

अन्ततः निष्कर्ष यह है कि जीव व आत्मा में वही अन्तर है जो झूठ (स्वप्न) और सत्य में है।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा