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अवतार एवं परब्रह्म के प्रकटन में भेद

गीता में योगेश्वर श्री कृष्ण जी कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब मै धर्म की वृद्धि के लिए अवतरित होता हूँ । उनका यह कथन संसार के कल्याण के लिए अवतरित होने वाले महापुरुषों की भावना से सम्बन्धित है । वेदान्त ने भी इसी तथ्य की तरफ संकेत किया है कि जीवनमुक्त महापुरुष संसार में धर्म की स्थापना हेतु अवतरित होते रहते हैं । पौराणिक ग्रन्थों में विष्णु भगवान के द्वारा अवतार धारण करना भी इसी तथ्य की पुष्टि करता है । छान्दोग्य उपनिषद् के षष्ठ प्रपाठक का कथन है कि आत्मरति (परब्रह्म के प्रति परम प्रेम रखने वाला) पुरुष स्वराट् (शुद्धज्ञान स्वरूप) होता है । इस प्रकार के महापुरुष ही संसार के कल्याणार्थ शरीर धारण करते रहते हैं, जिन्हे पौराणिक मान्यता में 'अवतार' की संज्ञा दी जाती है ।

परन्तु परब्रह्म अक्षरातीत की लीला इससे भिन्न है । वेद के कथनानुसार- सच्चिदानन्द परब्रह्म का अवतार होना ��म्भव नहीं है । वेद, गीता, उपनिषदों में वर्णित कूटस्थ, ध्रुव (अखण्ड), परिणाम से रहित ब्रह्म कभी भी गर्भ में नहीं आ सकता ।

यह गहन जिज्ञासा का विषय है कि बहुदेव उपासना तथा परब्रह्म के अवतारवाद का निषेध करने वाला 'निजानन्द सम्प्रदाय' किस प्रकार यह घोषित करता है कि वर्तमान कलियुग में परब्रह्म की शक्ति ने दो भौतिक तनों में लीला की है ?

वस्तुतः जिन दो तनों (श्री देवचन्द्र और श्री मिहिरराज) में परब्रह्म के प्रकट होकर लीला करने की बात की जाती है, वह उनकी आयु की चालीस वर्ष के बाद की बात है । जब दोनो तनों की आयु ४० वर्ष की थी, तो उन तनों में विद्यमान आत्माओं ने अपने प्रियतम परब्रह्म का प्रत्यक्ष साक्षात्कार किया । जिस प्रकार अग्नि में तप कर लोहा अग्नि के साधर्म्य (समान गुण) बन जाता है, उसी प्रकार परब्रह्म के साक्षात्कार द्वारा परब्रह्म की साधर्म्यता प्राप्त कर ली जाती है । मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है कि ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म के स्वरूप जैसा हो जाता है (मु. उ. ३/२/९) । श्री निजानन्द सम्प्रदाय में इसी सिद्धान्त को मानकर उन्हें 'ब्रह्मस्वरूप' माना जाता है ।

पौराणिक मान्यतानुसार सभी अवतारों को गर्भ में जन्म लेने से जोड़ा जाता है । रामचरित्र मानस का 'रामावतार' के सम्बन्ध में कथन है कि 'जा दिन से हरि गर्भहि आये', परन्तु श्री निजानन्द सम्प्रदाय की मान्यता इससे भिन्न है । सच्चिदानन्द परब्रह्म अक्षरातीत कभी भी माता के गर्भ में नहीं आ सकते । पंचभौतिक तन के जन्म लेने के पश्चात् भी मात्र परब्रह्म की आवेश और जोश की शक्ति का ही उसमें प्रकटन हो सकता है । इसी प्रकार अक्षरातीत की आत्मा भी कभी गर्भ में प्रवेश नहीं कर सकती , अपितु जीव के जन्म लेने के पश्चात् ही वह उसमें प्रकट होती है । 

परमधाम अनन्त सूर्यों के समान प्रकाशमान है । वहां से एक कण भी न तो इस नश्वर जगत् में आ सकता है और न यहां से कुछ वहां जा सकता है । परब्रह्म श्री प्राणनाथ जी तथा उनकी आत्माओं का निज स्वरूप उस अनन्त परमधाम में अखण्ड रूप से विद्यमान है । यदि उनका आवेश स्वरूप इस सांसारिक नश्वर तन में प्रकट होता है, तो उसे ही परब्रह्म के प्रकटन की संज्ञा दी जाती है । अनेक धर्मग्रन्थों में, दुर्लभ घटना के रूप में, अक्षरातीत के आवेश स्वरूप द्वारा इस अट्ठाइसवें कलियुग में प्रकट होकर अलौकिक ब्रह्मज्ञान के प्रकटीकरण का वर्णन है ।  

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा