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  विजयाभिनन्द बुद्ध  »  कलियुग में प्रकटन  »  श्री इन्द्रावती जी की लीला  »  अक्षरातीत श्री प्राणनाथ के रूप में शोभा

अक्षरा��ीत श्री प्राणनाथ के रूप में शोभा

श्री मिहिरराज जी ने आत्म जागृति के उद्देश्य से सभी सुन्दरसाथ को एकत्रित करने की योजना बनाई, किन्तु जामनगर के वज़ीर के यहां झूठी चुगली हो जाने के कारण उन्हें हब्सा में नज़रबन्द कर दिया गया । हब्सा में अपने प्रियतम के विरह में तड़प-तड़प कर उन्होंने अपने शरीर को मात्र हड्डियों का ढांचा बना दिया । अन्ततोगत्वा जब इन्द्रावती की आत्मा व मिहिरराज का जीव शरीर छोड़ने वाले थे, तब सच्चिदानन्द परब्रह्म श्री प्राणनाथ जी युगल स्वरूप ने उन्हें साक्षात् दर्शन दिया तथा इन्द्रावती जी के हृदय को धाम बनाकर उसमें विराजमान हो गए । अब सब सुन्दरसाथ ने उन्हें प्राणनाथ, धाम धनी, श्री राज, श्री जी, आदि शब्दों से सम्बोधित करना शुरु कर दिया, जिनका अर्थ होता है परब्रह्म । इस प्रकार 'अक्षरातीत श्री प्राणनाथ' के रूप में उनकी शोभा हुई ।

अब उनके तन से परब्रह्म के आवेश स्वरूप द्वारा श्री मुख वाणी (श्री कुलजम स्वरूप) का अवतरण प्रारम्भ हो गया । हब्सा में रास, प्रकासखटरुति ग्रन्थ उतरे । कलस ग्रन्थ की भी दो चौपाइयां उतरीं तथा सूरत में कलस ग्रन्थ पूर्ण हुआ । इसी प्रकार श्री प्राणनाथ जी के द्वारा परमधाम की आत्माओं की जागनी हेतु समय-समय पर भिन्न-भिन्न स्थानों पर आवश्यकतानुसार वाणी उतरती रही । सनन्ध की वाणी अनूपशहर में उतरी । खुलासा, खिलवत, परिकरमा, सागर, सिनगार, सिन्धीमारफत सागर का अवतरण श्री पद्मावती पुरी पन्ना में हुआ । कयामतनामा ग्रन्थ चित्रकूट में अवतरित हुआ । किरन्तन ग्रन्थ, जिसमें सभी विषयों का समावेश है, शुरु से लेकर जागनी यात्रा के अन्तिम पड़ाव तक उतरता रहा ।

वस्तुतः श्री प्राणनाथ जी के मुखारविन्द से अवतरित होने वाली तारतम वाणी की महत्ता वही समझ सकता है, जो सम्पूर्ण वेद-वेदांग तथा कतेब ग्रन्थों में डुबकी लगाते-लगाते थक गया हो, किन्तु यथार्थ सत्य को जानने का सच्चा जिज्ञासु हो । ब्रह्मवाणी श्री कुलजम स्वरूप के अवतरण से संसार के सभी संशय मिट गए तथा परमधाम का ज्ञान पहली बार इस जगत में प्रकट हुआ ।

 

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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