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  विजयाभिनन्द बुद्ध  »  कलियुग में प्रकटन  »  आनन्द अंग श्री श्यामा जी की लीला  »  श्री निजानन्द स्वामी के रूप में शोभा

श्री निजानन्द स्वामी के रूप में शोभा

श्री देवचन्द्र जी ने १४ वर्षों तक नवतनपुरी में निष्ठाबद्ध होकर भागवत की कथा सुनी । वे प्रातःकाल जलपान तभी करते थे जब कथा का श्रवण कर लेते । लम्बी अवधि तक तीव्र ज्वर तथा अत्यधिक कमजोरी भी उनकी निष्ठा को नहीं हिला सकी । वैद्य व परिवारजनों का दबाव तथा प्राणसंकट भी उनके इस आदर्श को नहीं बदल सका कि 'धर्म है तो देह है' ।

अन्ततः सभी कसौटियों पर खरा उतरने पर, जब श्री देवचन्द्र जी की आयु ४० वर्ष की हो गई तो श्याम जी के मंदिर में कथा सुनते समय साक्षात् परब्रह्म अक्षरातीत ने उन्हें दर्शन दिया । अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी ने उन्हें परमधाम के प्रेम संवाद, ब्रज एवं रास लीला तथा जागनी ब्रह्माण्ड की सारी बातें बतायी और उनके धाम हृदय में आवेश स्वरूप से विराजमान हो गए । तारतम ज्ञान प्राप्त होने पर श्री देवचन्द्र जी के सभी संशय मिट गये और उनकी दृष्टि अखण्ड परमधाम को देखने लगी ।

यहां यह प्रश्न उठता कि भागवत में वर्णित ज्ञान तो क्षर तक ही सीमित है, फिर उसका श्रवण करने से श्री देवचन्द्र जी को परब्रह्म अक्षरातीत का साक्षात्कार कैसे हो गया ? भागवत निश्चय ही स्वाप्निक बुद्धि का ज्ञान है । श्री देवचन्द्र जी को साक्षात्कार होने का मूल कारण है- उनके तन में विराजमान श्री श्यामा जी की आत्मा तथा उनकी अपने प्रियतम अक्षरातीत के प्रति अटूट निष्ठा । इस लीला में भागवत श्रवण एक निष्ठात्मक कर्म है । यथार्थ में जागृत बुद्धि के तारतम ज्ञान के अवतरित होने के पश्चात् स्वाप्निक ग्रन्थों की उपयोगिता केवल प्रमाण देने के लिए है ।

बृहद्सदाशिव संहिता में यह वर्णन है कि चिदघन स्वरूप परब्रह्म के आवेश से युक्त अक्षर ब्रह्म की बुद्धि अक्षरातीत की प्रियाओं को जाग्रत करने के लिए तथा सम्पूर्ण लोकों को मुक्ति देने के लिए भारतवर्ष में प्रकट होगी । वह प्रियतम के द्वारा स्वामिनी (श्री श्यामा जी) के हृदय में स्थापित किए जाने पर चारों ओर फैलेगी । (बृहद्सदाशिव संहिता श्रुति रहस्य १८,१९)

रसूल अल्लाह श्री मुहम्मद साहब ने फरमाया- मेरे और ईसा के दरम्यान और कोई भी नबी नहीं होगा और बेशक ईसा (रूहअल्लाह श्री श्यामा जी) उतरेंगे । उनका रंग सुर्खी और सफेदी के दरम्यान है, और कपड़े हल्के साधारण पहने होंगे । तबाह कर देगा अल्लाह, इनके ज़माने में सब मज़हबों को सिवाय इस्लाम (श्री निजानन्द सम्प्रदाय) के, हलाक करेंगे वे दज्जाल को, फिर दुनिया में रहेंगे चालीस साल तक । (दाऊद तरज़मा कलमा वहीद- उल ज़मा पृ.३३८/६१८)

पुराण संहिता में कहा गया है कि वह सुन्दरबाई (श्री श्यामा जी) अक्षरातीत का सभी प्रियाओं की सुरताओं को जाग्रत करेंगी । इस प्रकार इस जागनी के मार्ग में सुन्दरी को ही सदगुरु माना गया है । (पु. सं. ३४/४९)

एते दिन त्रैलोक में , हुती बुध सुपन ।

सो बुध जी बुध जागृत ले , प्रकटे पुरी नौतन ।। (श्री मुख वाणी- परि. २/११)

आज तक इस संसार में स्वप्न की बुद्धि का ज्ञान था, जिससे निराकार से आगे की सुध नहीं थी । यदि कहीं निराकार से परे का वर्णन है भी, तो वह सब संकेतों में है जिसे समझना संभव नहीं था । अब अक्षरातीत परब्रह्म अल्लाह तआला सर्वप्रथम जागृत बुद्धि (तारतम) का ज्ञान लेकर श्री श्यामा जी (रूह अल्लाह) के हृदय में पधारे हैं । इस ज्ञान के द्वारा सभी धर्मग्रन्थों में छिपे गुह्य रहस्यों का भेद खुल गया तथा निराकार से परे अक्षर ब्रह्माण्ड व दिव्य परमधाम का पूर्ण रूप से पता चल गया ।

इस घटना के पश्चात् श्री देवचन्द्र जी 'निजानन्द स्वामी' के रूप में प्रसिद्ध हो गए तथा उनके अलौकिक ब्रह्मज्ञान की चर्चा सुनने के लिए जनसमूह उमड़ पड़ा । उनके द्वारा दिये हुए तारतम ज्ञान का अनुसरण करने वाले 'सुन्दरसाथ' कहलाये । सुन्दरसाथ के समूह में हरिदास जी भी सपरिवार सम्मिलित हुए, जिन्होंने पहले श्री देवचन्द्र जी को मन्त्र दीक्षा दी थी ।

जब श्री देवचन्द्र जी चर्चा करते थे तो साक्षात् अक्षरातीत प्रकट होकर आडिका लीला करते थे तथा सुन्दरसाथ को दर्शन लाभ मिलता । वे कभी-कभी सुन्दरसाथ को कुछ वस्तु भेंट भी दे जाते थे । इस प्रकार कुछ वर्षों तक अक्षरातीत ने श्री श्यामा जी (श्री देवचन्द्र) के हृदय में विराजमान होकर लीला की ।

सम्वत् १७१२ में इस तन को त्याग कर युगल स्वरूप सच्चिदानन्द श्री इन्द्रावती जी (श्री मिहिरराज) के हृदय में विराजमान हो गये । इस प्रकार श्री श्यामा जी की आत्मा ने दूसरे तन से लीला प्रारम्भ की ।

 

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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