Shri Prannath Gyanpeeth-     मासिक पत्रिका आर्थिक सेवा सम्पर्क करें
                                                                 




मुख्य संस्था अध्यात्म निजानन्द दर्शन विजयाभिनन्द बुद्ध ब्रह्मवाणी (तारतम) चितवनि महान व्यक्तित्व साहित्य प्रवचनमाला सुन्दरसाथ
श्री सुन्दरसाथ
     प्रणामी धर्म 
     श्री प्राणनाथ जी की लीला »
          पहला दिन 
          दूसरा दिन 
          तीसरा दिन 
          चौथा दिन 
          पाँचवा दिन 
          छठा दिन 
          सातवाँ दिन 
          सात दिन की लीला का सार 
     श्री प्राणनाथ व श्री कृष्ण 
     Shri Prannath & Shri Krishna 
     श्री प्राणनाथ जी की पहचान 
 
 
 
 
  सुन्दरसाथ  »  श्री प्राणनाथ जी की लीला  »  दूसरा दिन

दूसरा दिन

रास लीला (अखण्ड योगमाया के केवल ब्रह्म में)

काल- पाँच हजार वर्ष पूर्व

श्री कृष्ण के तन में- सच्चिदानन्द श्री प्राणनाथ जी (श्री राज जी) का आवेश, अक्षर ब्रह्म की आत्मा

 

चौपाई-

एकीगमां साथ स्यामाजी , कांई बीजी गमां प्राणनाथ ।

क्रीडा कीजिए जलमां , विलसिए वालाजीने साथ ॥ (श्री मुख वाणी- रास ४५/९)

 

शोभा- अक्षर ब्रह्म की आत्मा को

सच्चिदानन्द स्वरूप- नहीं ; यह केवल सत् अंग श्री अक्षर ब्रह्म व चिद् अंग श्री राज जी की लीला थी ; आनन्द अंग श्री श्यामा जी राधा के तन में थीं

लीला- प्रेममय किशोर लीला

      अक्षर ब्रह्म की आत्मा को अपने स्वरूप तथा धाम की कुछ भी पहचान नहीं थी

      सखियों को भी अपने मूल स्वरूप व धाम की कुछ पहचान नहीं थी (अज्ञानमय लीला) 

लीला के पश्चात् परिणाम-

श्री प्राणनाथ जी की शक्ति व अक्षर ब्रह्म की आत्मा का गमन

श्री कृष्ण नामक तन की अखण्ड गोलोक (योगमाया) के सबलिक ब्रह्म (चौथी बहिश्त) में मुक्ति

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा