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छठा दिन

मोमनों की लीला (पूरे विश्व में)

काल- विक्रम सम्वत् १७५८ से अज्ञात समय तक (अभी चल रही है)

चौपाई-

इंद्रावती के मैं अंगे संगे , इंद्रावती मेरा अंग ।

जो अंग सौंपे इंद्रावती को , ताए प्रेमें खेलाऊं रंग ॥

पिउ जगाई मुझे एकली , मैं जगाऊं बांधे जुथ ।

ए जिमी झूठी दुख की , सो कर देऊं सत सुख ॥ (श्री मुख वाणी- क.हि. २३/६६,४४)

लीला- साक्षात् अक्षरातीत युगल स्वरूप श्री राज श्यामा जी पन्ना में श्री इन्द्रावती जी के हृदय में विराजमान हैं, परन्तु लौकिक शरीर से लीला नहीं करेंगे । सभी ब्रह्मसृष्टियां (मोमन) श्री मुख वाणी व चितवनि के मार्ग का अनुसरण करके प्राणनाथ जी को रिझायेंगी व अन्य सुन्दरसाथ की जागनी करेंगी । जो सुन्दरसाथ श्री प्राणनाथ जी पर पूर्ण समर्पण करेंगे, उनके हृदय में श्री युगल स्वरूप का वास हो जाएगा तथा वे परम आत्मिक आनन्द प्राप्त करेंगे । ऐसे परमहंसों के माध्यम से श्री प्राणनाथ जी आज भी जागनी रास की यह लीला कर रहे हैं ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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