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पहला दिन

ब्रज लीला (गोकुल व नंद गाँव में)

काल- पाँच हजार वर्ष पूर्व

श्री कृष्ण के तन में- अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी (श्री राज जी) का आवेश, अक्षर ब्रह्म की आत्मा, विष्णु भगवान का जीव

 

चौपाई-

मूल सुरत अछर की जेह , जिन चाह्या देखों प्रेम सनेह ।

सो सुरत धनी को ले आवेस , नन्द घर कियो प्रवेस ॥ (श्री मुख वाणी- प्र.हि. ३७/२९)

मांगा किया राधाबाई का , पर ब्याहे नहीं प्राणनाथ ।

मूल सनमंधे एके अंगे , विलसत वल्लभ साथ ॥ (श्री मुख वाणी- क.हि. १९/३१)

 

शोभा- अक्षर ब्रह्म की आत्मा को

सच्चिदानन्द स्वरूप- नहीं ; यह केवल सत् अंग श्री अक्षर ब्रह्म व चिद् अंग श्री राज जी की लीला थी ; आनन्द अंग श्री श्यामा जी राधा के तन में थीं

लीला- मधुर बाल लीला

      अक्षर ब्रह्म की आत्मा को अपने स्वरूप तथा धाम की कुछ भी पहचान नहीं थी

      सखियों को भी अपने मूल स्वरूप व धाम की कुछ पहचान नहीं थी (अज्ञानमय लीला) 

लीला के पश्चात् परिणाम-

श्री प्राणनाथ जी की शक्ति व अक्षर ब्रह्म की आत्मा का गमन

श्री कृष्ण नामक विष्णु जीव को भेंटस्वरूप अखण्ड गोलोक (योगमाया) के सबलिक ब्रह्म (पाँचवी बहिश्त) में मुक्ति

श्री कृष्ण नामक तन की मृत्यु

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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