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चौथा दिन

मलकी स्वरूप की लीला (जामनगर में)

काल- विक्रम सम्वत् १६३८ से १७१२

श्री देवचन्द्र के तन में- पूर्णब्रह्म श्री प्राणनाथ जी (श्री राज जी) का आवेश, श्री श्यामा जी की आत्मा

चौपाई-

तब श्रीमुख वचन कहे प्राणनाथ , ढूंढ काढ़नो अपनो साथ ।

माया मिने आई सृष्ट ब्रह्म , सो बुलावन आए हैं हम ॥ (श्री मुख वाणी- प्र.हि. ३७/८२)

 

शोभा- श्री श्यामा जी की आत्मा को

सच्चिदानन्द स्वरूप- नहीं ; यह केवल चिद् अंग श्री राज जी व आनन्द अंग श्री श्यामा जी की लीला थी

लीला- ४० वर्ष की आयु में श्री राज जी (श्री प्राणनाथ जी) के दर्शन

      एकपक्षीय ज्ञान होने के कारण अधूरा स्वरूप (पूर्ण पहचान नहीं)

      पूर्णमासी के चन्द्र के समान शोभा

लीला के पश्चात् परिणाम-

श्री प्राणनाथ जी की आवेश शक्ति व श्यामा जी की आत्मा का श्री इन्द्रावती के हृदय में निवास

श्री देवचन्द्र के जीव को भेंटस्वरूप अखण्ड योगमाया के सत्स्वरूप ब्रह्म (पहली बहिश्त) में मुक्ति मिलेगी (सातवें दिन)

श्री देवचन्द्र नामक तन का अन्तर्धान

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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