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पाँचवा दिन

हकी स्वरूप की लीला (भारत, पाकिस्तान व अरब में)

काल- विक्रम सम्वत् १६७५ से १७५१

श्री मिहिरराज के तन में- पूर्णब्रह्म श्री प्राणनाथ जी (श्री राज जी) का आवेश, श्री श्यामा जी की आत्मा, अक्षर ब्रह्म की आत्मा, जागृत बुद्धि का फरिश्ता अस्राफिल, जोश का फरिश्ता ज़बराइल, श्री इन्द्रावती जी की आत्मा

चौपाई-

श्री धनी जी को जोस आतम दुलहिन , नूर हुकम बुध मूल वतन ।

ए पांचों मिल भई महामत , वेद कतेबों पहुंची सरत ॥

ए बानी चित दे सुनियो साथ , कृपा करके कहें प्राणनाथ ।

ए किव कर जिन जानो मन , श्री धनीजी ल्याए धामथें वचन ॥ (प्र.हि. ३७/१०१,१०)

 

शोभा- श्री श्यामा जी व इन्द्रावती जी की आत्मा को

सच्चिदानन्द स्वरूप- हाँ ; सत् अंग श्री अक्षर ब्रह्म, चिद् अंग श्री राज जी व आनन्द अंग श्री श्यामा जी, सभी स्वरूपों के समावेश से पूर्ण सच्चिदानन्द स्वरूप की लीला

लीला-

४० वर्ष की आयु में इन्द्रावती जी को श्री युगल स्वरूप के दर्शन

अक्षरातीत के आवेश द्वारा विभिन्न स्थानों व समय पर श्री क़ुलज़म स्वरूप की चौपाइयों का अवतरण 

साक्षात् अक्षरातीत, विजयाभिनन्द बुद्ध, इमाम मुहम्मद महदी, आखिरी मूसा, आदि कहलाने की शोभा (यह शोभा किसी अन्य स्वरूप को नहीं)

भारत (दिल्ली) के बादशाह औरंगज़ेब (कट्टरपंथी मुस्लिम) से कठोर संघर्ष व विजय 

सूर्य के समान पूर्ण, श्रेष्ठतम, ज्ञानमय, सर्वशक्तिमान व अनन्त महिमा से युक्त स्वरूप

परमधाम की आत्माओं को जाग्रत करके वापस ले चलने के लिए साक्षात् युगल स्वरूप का प्रकटन व जागनी लीला

लीला के पश्चात् परिणाम-

सभी शक्तियों का सातवें दिन की लीला के अन्त तक श्री इन्द्रावती के हृदय में निवास

श्री मिहिरराज के जीव को अखण्ड योगमाया के सत्स्वरूप ब्रह्म (पहली बहिश्त) में सर्वोच्च स्थान मिलेगा (सातवें दिन)

श्री मिहिरराज का तन छठे दिन की लीला के अन्त तक गुम्मट जी (पन्ना) में सुरक्षित विराजमान

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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