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  निजानन्द दर्शन  »  प्रकृति की उत्पत्ति व लय

प्रकृति की उत्पत्ति व लय

श्री प्राणनाथ जी द्वारा प्रदत्त तारतम ज्ञान से इस सृष्टि उत्पत्ति के सभी रहस्यों का भेद खुल गया है , जिन्हें आज तक कोई भी स्पष्ट नहीं कर सका था । उन्होंने कहा है-

ना ईश्वर ना मूल प्रकृति , ता दिन की कहूँ आपा बीती ।

निज लीला ब्रह्म बाल चरित्र , जाकी इच्छा मूल प्रकृत ।। ( प्र. हि. ३७/१५ )

अर्थात् सृष्टि के पूर्व मूल प्रकृति , प्रकृति , महत्तत्व और अहंकार नहीं था । उस समय 'नारायण' ( विराट् पुरुष ) भी नहीं थे । असंख्य ब्रह्माण्डों को अपने संकल्प मात्र से उत्पन्न करने वाले ब्रह्म के अन्दर अभी सृष्टि उत्पत्ति की कामना नहीं हुई थी ।

ब्रह्म और प्रकृति के द्वारा ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई । यहाँ ब्रह्म से अभिप्राय अक्षर ब्रह्म के मूल स्वरूप से नहीं , अपितु उनके चतुर्थ पाद मन स्वरूप अवयाकृत ब्रह्म से है , जो अनादि और चेतन हैं । उन्हे वेद में दक्ष भी कहा गया है । प्रकृति भी दो प्रकार की हैं - मूल प्रकृति व जड़ प्रकृति । अव्याकृत ब्रह्म के संकल्प (इच्छा) को ही मूल प्रकृति कहते हैं । जबकि सत्व , रज और तम की साम्यावस्था को जड़ प्रकृति कहते हैं, जिसे अदिति और माया नाम से भी जाना जाता है ।

श्रीमुख वाणी में कहा है-                                                    

मूल प्रकृति मोह अहं थे , उपजे तीनों गुन ।

सो पांचों में पसरे , हुई अंधेरी चौदे भवन ।।  (कि. २१/२)

मूल प्रकृति से सत्व , रज और तम की साम्यावस्था वाली जड़ प्रकृति ( कारण प्रकृति ) उत्पन्न होती है । जड़ प्रकृति की साम्यावस्था भंग होने पर उसी से महत्तत्व (मोह) की रचना होती है । महत्तत्व से अहंकार उत्पन्न होता है।

अहंकार से पाँच सूक्ष्मभूत- शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गन्ध उत्पन्न होते हैं । जब तक इन पाँचो सूक्ष्मभूतों की रचना नहीं हो जाती तब तक किसी भी पदार्थ के स्वरूप का वर्णन नहीं हो सकता । तत्पश्चात् इन पाँच सूक्ष्मतम कणों के मेल से आकाश का एक अणु बनता है। आकाश से वायु , वायु से अग्नि , अग्नि से जल और जल से पृथ्वी तत्व की रचना होती है । इन तत्वों से असंख्य लोक लोकान्तरों का निर्माण हो जाता है ।

प्रकृति पैदा करे , ऐसे कई इंड आलम ।

ए ठौर माया ब्रह्म सबलिक , त्रिगुन की परआतम ।।  ( कि. ६५/१० )

जिस प्रकृति से १४ लोकों के इस ब्रह्माण्ड जैसे अनेको ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति होती है , उस प्रकृति तथा आदि नारायण का मूल स्थान सबलिक ब्रह्म के स्थूल ( अव्याकृत के महाकारण ) में स्थित है । जिस प्रकार असल स्वरूप के चेतन होने पर भी उसका प्रतिबिम्ब स्वप्नवत् और जड़ होता है , उसी प्रकार अव्याकृत या सबलिक की प्रकृति तो चेतन है परन्तु हद की प्रकृति जड़ तथा नश्वर है ।

उस महत्तत्व के अन्दर सबलिक ( अक्षर ब्रह्म का तृतीय पाद ) से चेतन तत्व आता है जो सभी जीवों का कारण है । महाप्रलय के पश्चात सभी जीव महत्तत्व के अन्दर स्थित उस चेतन तत्व ( विराट पुरुष , क्षर पुरुष ) में लीन हो जाते हैं । प्रकृति और जीव अपने वर्तमान स्वरूप से अनादि नही हैं , किन्तु प्रवाह से अनादि हैं । अनादि काल से अक्षर ब्रह्म के तीसरे और चौथे पाद के द्वारा सृष्टि की उत्पत्ति , पालन और संहार होता रहा है तथा प्रकृति और जीव महाप्रलय में अपने कारण में लीन होते रहे हैं ।

प्रले प्रकृति जब भई , तब पाँचों चौदे पतन ।

मोह अहं सब उड़ै , ना रहे सरगुन ना निरगुन।। ( कि. २१/३ )

प्रकृति (माया) न तो अनादि है , न ही अखण्ड है । जब महाप्रलय में इस सम्पूर्ण प्रकृति मण्डल का प्रलय हो जाता है तो उस समय पांचो तत्व , चौदे लोक ( वैकुण्ठ सहित ) , सगुण-निरगुण सभी पदार्थ , अहंकार तथा मोह तत्व (निराकार) का विनाश हो जाता है ।

ए माया आद अनाद की , चली जात अंधेर ।

निरगुन सरगुन होए के व्यापक , आए फिरत है फेर ।। ( कि. ६५/१ )

अनादि ब्रह्म की यह आदि माया ( कालमाया ) सृष्टि के प्रारम्भ ही से अज्ञान स्वरूपा है , जो सभी प्राणियों को अपने जाल में फँसाती रही है । यद्यपि यह अपने मूल रूप में शब्द , स्पर्श , रूप , रस तथा गन्ध आदि गुणों से रहित निराकार है , किन्तु सगुण रूप में इन गुणों को धारण कर लेती है अर्थात् निराकार माया (निर्गुण) ही सृष्टि उत्पत्ति काल में स्थूल रूप (सगुण) कार्य रूप जगत में परिवर्तित हो जाती है । इसका मूलरूप कार्य रूप जगत (सगुण) में अति सूक्ष्म रूप (आकाश) से व्यापक रहता है । प्रलय काल में यही प्रकृति (माया) साकार से निराकार में रूपांतरित हो जाती है । सभी प्राणी इसी सर्वव्यापक माया के जाल में फँसकर जन्म-मरण के चक्र में भटकते रहते हैं ।

सृष्टि उत्पत्ति व लय का यह क्रम अनादि काल से चला आ रहा है तथा अनन्त काल तक चलता रहेगा । ब्रह्म इस नाशवान प्रकृति (सृष्टि) से सर्वथा परे है ।

( विस्तृत अध्ययन के लिए श्री राजन स्वामी कृत ग्रन्थ "सत्याञ्जलि" पढ़ें )

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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