Shri Prannath Gyanpeeth-     मासिक पत्रिका आर्थिक सेवा सम्पर्क करें
                                                                 




मुख्य संस्था अध्यात्म निजानन्द दर्शन विजयाभिनन्द बुद्ध ब्रह्मवाणी (तारतम) चितवनि महान व्यक्तित्व साहित्य प्रवचनमाला सुन्दरसाथ
श्री प्राणनाथ जी ही विजयाभिनन्द बुद्ध
     श्री प्राणनाथ जी का वास्तविक परिचय 
     श्री प्राणनाथ जी का प्रकटन समय
     हिन्दू पक्ष »
          धर्मग्रन्थों की भविष्यवाणियाँ 
          कबीर वाणी का सार 
          हरिद्वार का शास्त्रार्थ »
     मुस्लिम पक्ष » 
          क़ुरआन व हदीसों की भविष्यवाणी 
          क़ियामत का ज़ाहिर होना 
          क़ुरआन के गुह्य रहस्य 
          मक्का-मदीना से आये वसीयतनामे 
          औरंगज़ेब का आज़म को अंतिम पत्र  
     ईसाई पक्ष »
          बाइबल की भविष्यवाणी 
 
 
 
  विजयाभिनन्द बुद्ध  »  श्री प्राणनाथ जी ही विजयाभिनन्द बुद्ध  »  हिन्दू पक्ष  »  कबीर वाणी का सार

कबीर वाणी का सार

श्री प्राणनाथ जी ने कबीर जी की वाणी में से निम्न रहस्यमय शब्दों को उद्घृत किया तथा गादीपति आचार्य श्री चिन्तामणि जी को इसका अर्थ स्पष्ट किया-

एक पलक से गंग जो निकसी , हो गयो चहुं दिस पानी ।

���हि पानी दो पर्वत ढांपे , दरिया लहर समानी ।।

परमधाम में प्रेम और आनन्द की लीला चिद् (परब्रह्म अक्षरातीत) और आनन्द (श्री श्यामा जी) रूपी पलकों से होती है । चिद् स्वरूप ने इच्छा रूपी गंगा को प्रकट किया, जिसमें सत् (अक्षर ब्रह्म) और आनन्द रूपी दोनों पर्वत डूब गये अर्थात् सत् आनन्द को जानना चाहता है और आनन्द सत् को । इसी इच्छा रूपी गंगा की लहरों का सर्वरस सागर में समाना ही परब्रह्म की पूर्ण पहचान है ।

भावार्थ- यहां पर परमधाम में अक्षरातीत परब्रह्म व उनकी आत्माओं के बीच होने वाले प्रेम संवाद की ओर संकेत किया गया है । उस संवाद का निर्णय करने के लिए चिद् स्वरूप अक्षरातीत परब्रह्म ने अपनी आनन्द अंग आत्माओं के अन्दर माया के नश्वर संसार को देखने की इच्छा उत्पन्न कर दी । दूसरी तरफ सत् अंग अक्षर ब्रह्म में यह इच्छा उत्पन्न कर दी कि वे अक्षरातीत व आत्माओं की गुह्य प्रेम की लीला को देखें । इस प्रकार सच्चिदानन्द परब्रह्म के सत् अंग अक्षर ब्रह्म व आनन्द अंग आत्माओं रूपी दो पर्वतों (अति श्रेष्ठ स्वरूप) को इच्छा रूपी जल ने डुबो दिया ।

उड़ मक्खी तरुवर चढ़ बैठी , बोलत अमृत बानी ।

उस मक्खी के मक्खा नाहीं , बिन पानी गर्भानी ।।

तिन गर्भे गुन तीनों जाए , वो तो पुरुष अकेला ।

कहे कबीर या पद को बूझे , सो सदगुरु मैं चेला ।।

परब्रह्म की आदेश (हुक्म) शक्ति ने संसार रूपी वृक्ष पर बैठकर ब्रह्मज्ञान की अमृतवाणी कही है । उस आदेश शक्ति का कोई भी स्वामी नहीं है, अपितु उसने अपने संकल्प मात्र से मूल प्रकृति रूपी गर्भ को धारण किया, जिससे सत्व, रज और तम ये तीनों गुण प्रकट हुए । परम पुरुष परब्रह्म इस खेल से न्यारा है । इस रहस्य को खोलने वाले मेरे सदगुरु हैं तथा मै (कबीर) उनका शिष्य हूँ । 

भावार्थ- इन पद्यों (शब्द) में यह स्पष्ट किया गया है कि परब्रह्म अक्षरातीत का स्वरूप इस नश्वर जगत से सर्वथा परे है तथा उनके आदेश से किस प्रकार प्रकृति की उत्पत्ति होती है ।

वस्तुतः तारतम ज्ञान के बिना इन पद्यों का वास्तविक अर्थ कदापि स्पष्ट नहीं हो सकता । कबीर जी के इन रहस्यमय पद्यों को विजयाभिनन्द बुद्ध श्री प्राणनाथ जी के अतिरिक्त कोई और नहीं खोल सकता था । इस प्रकार इन पद्यों का अर्थ खोलकर अक्षरातीत ने अपने आगमन का प्रमाण दिया है ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा