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श्री निजानन्द सम्प्रदाय की पद्धति

सम्वत् १७३५ में हरिद्वार के महाकुम्भ में श्री प्राणनाथ जी ने हिन्दू धर्म के सभी आचार्यों को शास्त्रार्थ में नतमस्तक करके स्वयं को परब्रह्म अक्षरातीत सिद्ध किया । तद्पश्चात् उन्होंने श्री निजानन्द सम्प्रदाय की पद्धति का वर्णन किया ।

इस पद्धति के प्रमाण कई ग्रन्थों में उपलब्ध हैं, परन्तु सम्पूर्ण पद्धति माहेश्वर तन्त्र ग्रन्थ के अध्याय २८ श्लोक ४५ से ५४ में उपलब्ध है, जिसका शब्दार्थ निम्न वर्णित है-

शिव जी कहते हैं कि हे सुन्दरी (पार्वती) ! ब्रह्मानन्द रस और शुद्ध ब्रह्मज्ञान से पूर्ण ब्रह्मसृष्टियों की पद्धति को मै तुमसे कहता हूँ ।।४५।। निश्चय ही उनका गोत्र चिदानन्द है । परब्रह्म के आनन्द के स्वरूप श्री श्यामा जी हमारे सदगुरु हैं । शिखा ज्ञानमयी कही गई है । और सूत्र अक्षर ब्रह्म हैं ।।४६।। परब्रह्म के आनन्द अंग किशोर स्वरूप वाली 'श्यामा जी' ही परम इष्ट हैं और पूर्ण ब्रह्म (पुरुषोत्तम) पूजनीय हैं जिनको पाने का मार्ग अनन्य पतिव्रता साधन कहा गया है ।।४७।। नित्य वृन्दावन में सुख विलास का स्थान माना गया है । परब्रह्म के युगल स्वरूप का जाप और मन्त्र तारतम माना गया है ।।४८।। ब्रह्म विद्या को परादेवी तथा सनातन ब्रह्म को देवता माना गया है । गोलोक को शाला तथा उर्ध्वद्वार (अखण्ड में जाने का रास्ता) कहा गया है ।।४९।। स्वसं वेद को वेद कहा गया है और इसका फल अखण्ड में नित्य विहार है । बेहद और अक्षर ब्रह्म से भी परे दिव्य ब्रह्मपुर ही धाम कहा गया है ।।५०।। सदगुरु के चरण ही क्षेत्र है, जो सबको शुद्ध करने वाले हैं । अखण्ड यमुना जी ही तीर्थ हैं, तथा प्रेम लक्षणा भक्ति ही मनन करने योग्य है ।।५१।। शास्त्र के रूप में श्रीमद्भागवत् का श्रवण करना अद्भुत सार माना गया है । महाविष्णु ऋषि कहे गये हैं । जागृत बुद्धि का ज्ञान ही माना जाता है ।।५२।। 'कुल' का मूल परब्रह्म के आनन्द अंग को माना गया है, जो अखण्ड परमधाम में विराजमान हैं । परब्रह्म की आनन्द स्वरूपा आत्माओं द्वारा प्रचारित किया हुआ सम्प्रदाय निजानन्द (चिदानन्द) है ।।५३।। इस प्रकार पुरुषोत्तम नाम से यह पद्धति प्रसिद्ध है । इसलिए हे सुन्दरी (पार्वती) ! अपने कल्याण के लिये इसे अपने आचरण में लाना चाहिए ।।५४।।

श्री महामति जी की बीतक साहब में प्रकरण ३७ चौपाई ७७ से ८४ में वर्णित इसी पद्धति की व्याख्या निम्न है-

सतगुर ब्रह्मानंद हैं , सूत्र है अक्षर रूप ।

सिखा सदा तिनसे परे , चेतन चिद जो अनूप ।।७७।।

श्री निजानन्द सम्प्रदाय में किसी पंचभौतिक तन को सदगुरु नहीं माना जाता, अपितु परब्रह्म अक्षरातीत की आनन्द अंग (श्री श्यामा जी) को सदगुरु की महिमा दी गई है । उन्होंने ही सर्वप्रथम अज्ञानता के अन्धकार से युक्त इस सृष्टि में तारतम ज्ञान का प्रकाश किया । परम्परानुसार जनेऊ, आदि धागों को सूत्र माना जाता है, परन्तु यहाँ अक्षर ब्रह्म रूपी सूत्र को धारण करने की बात कही गई है क्योंकि वे परब्रह्म के प्रति संकेत करते हैं । "मै उस व्यापक प्रकृति रूपी सूत्र को जानता हूँ जिसमें ये प्रजाएँ पिरोई हुई हैं । मै सूत्र के भी सूत्र को जानता हूँ, जो कि महान ब्रह्म (अक्षर ब्रह्म) है" (अथर्व. १०/८/३८) । अर्थात् जो इस दूसरे सूत्र अक्षर ब्रह्म को जानता है, वही अक्षरातीत पूर्ण ब्रह्म को जान सकता है ।

सामान्यतः सिर पर बालों की चोटी रखने को शिखा कहते हैं, जो आठवें चक्र को दर्शाती है । निजानन्द सम्प्रदाय में ज्ञानमयी स्वरूप वाली शिखा का विधान है । अतः पराविद्या की दृष्टि से अक्षर ब्रह्म से परे चिदघन स्वरूप अक्षरातीत को शिखा कहा गया है ।

इस प्रकार जो हिन्दू परम्पराएँ शरीर अथवा नश्वर संसार तक ही सीमित थीं, निजानन्द सम्प्रदाय की पद्धति के प्रारम्भ में ही उन को पीछे छोड़ते हुए सच्चिदानन्द परब्रह्म के ही सत्, चिद व आनन्द स्वरूप की ओर संकेत किया गया है ।

सेवन है पुरुषोत्तम , गोत्र चिदानन्द जान ।

परम किशोरी इष्ट है , पतिव्रता साधन मान ।।७८।।

सेवन अर्थात् भक्ति, क्षर व अक्षर से परे एकमात्र उत्तम पुरुष (पुरुषोत्तम) अक्षरातीत की ही करी जाती है । निजानन्द सम्प्रदाय में किसी सांसारिक पुरुष से गोत्र नहीं माना जाता, अपितु परब्रह्म अक्षरातीत व उनकी आनन्द अंग (चिदानन्द युगल स्वरूप) को ही गोत्र माना गया है ।

परब्रह्म अक्षरातीत की आनन्द अंग श्री श्यामा जी (परम किशोरी), जिन्हें वेद में युवा स्वरूप वाला कहा गया है, को ही ब्रह्मसृष्टियों का इष्ट माना गया है क्योंकि वे सब उन्ही की अंग हैं । भक्ति का साधन नवधा भक्ति से परे अनन्य प्रेम लक्षणा भक्ति है अर्थात् आत्माएं अक्षरातीत को अपना पति (प्रियतम) मानकर अनन्य प्रेम के मार्ग पर चलती हैं । परमधाम की पवित्र लीला में इन लौकिक (पति-पत्नी) सम्बन्धों का अभाव है परन्तु संसार में अनन्य प्रेम को दर्शाने का यही एकमात्र साधन है । वेद में भी आत्मा को पत्नी कहा गया है ।

श्री युगल किशोर को जाप है, मन्त्र तारतम सोए ।

ब्रह्मविद्या देवी सही , पुरी नौतन मम जोए ।।७९।।

अखण्ड व आनन्दमयी परमधाम में विराजमान युगल स्वरूप (परब्रह्म व उनकी आनन्द अंग) को ही जपा जाता है । वह लीला रूप में दो हैं परन्तु असल स्वरूप तो एक ही है । हमारा मन्त्र तारतम है । एकमात्र तारतम ज्ञान से ही क्षर व अक्षर से परे अक्षरातीत परब्रह्म के धाम, स्वरूप व लीला की पहचान होती है । इसे संसार में प्रकट करने वाले स्वयं अक्षरातीत हैं ।

देवी वह हैं जो सांसारिक कष्टों को दूर करे तथा माया के अज्ञान से छुड़ाकर अखण्ड मुक्ति प्रदान करे । ब्रह्मविद्या (पराविद्या) को देवी का स्वरूप माना गया है । श्री प्राणनाथ जी द्वारा अवतरित श्री कुलजम स्वरूप वाणी ही परब्रह्म का ज्ञान देती है, अतः उसे ब्रह्मविद्या कहा गया है । नवतनपुरी (जामनगर, गुजरात) में सर्वप्रथम तारतम ज्ञान का प्रकटन प्रारम्भ हुआ । अतः नवतनपुरी आदरणीय पुरी है ।

अठोत्तर सौ पख साखा सही , शाला है गोलोक ।

सतगुर चरण को क्षेत्र है , जहां जाए सब सोक ।।८०।।

१०८ पक्षों को ही शाखा कहा गया है । आज तक कोई भी १०८ की व्याख्या नहीं कर सका । श्री प्राणनाथ जी द्वारा प्रकट किये तारतम ज्ञान से ही इसका भेद खुल सका है । १०८ से तात्पर्य अध्यात्म के १०८ पक्षों से है जो क्षर, अक्षर व अक्षरातीत में विस्तृत हैं, अतः उनसे तीनों का संक्षिप्त ज्ञान हो जाता है ।

संसार के ८१ पक्ष = ९ प्रकार की भक्ति (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चन, पाद सेवन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्म निवेदन) x ३ स्तर (प्रवाह, मर्यादा, पुष्ट) x ३ गुण (सत्, रज, तम) ।

बेहद के २ पक्ष - पहला पक्ष वल्लभाचार्य जी का है, जिन्होंने निराकार को पार करके अखण्ड गोलोक (योगमाया) का वर्णन किया । दूसरा पक्ष इस ब्रह्माण्ड में अवतरित अक्षर ब्रह्म की पांच वासनाओं (सदाशिव जी, विष्णु जी, सनकादि चार ऋषि, कबीर जी, सुकदेव ऋषि) का है, जिन्होंने अखण्ड योगमाया तक का ज्ञान दिया ।

अन्तिम २५ पक्ष अखण्ड योगमाया से भी परे दिव्य परमधाम के हैं, जिनका वर्णन श्री प्राणनाथ जी के अतिरिक्त आज तक इस ब्रह्माण्ड में कोई भी नहीं कर सका ।

अखण्ड गोलोक को शाला (आंगन) माना गया है । यहां गोलोक का तात्पर्य इस नश्वर जगत के किसी स्थान से नहीं है, अपितु वह तो क्षर ब्रह्माण्ड से परे अखण्ड योगमाया के ब्रह्माण्ड में है । माहेश्वर तन्त्र (५०/६६) में भी कहा गया है कि गोलोक कूटस्थ अक्षर ब्रह्म का साक्षात् हृदय है, जहां पुरुषोत्तम (अक्षरातीत) के द्वारा अखण्ड किया हुआ कृष्ण तन गोपियों के साथ क्रीड़ा करता है । सच्चिदानन्द परब्रह्म की आनन्द स्वरूपा श्री श्यामा जी के चरण कमल ही हमारा क्षेत्र हैं, जिनके दर्शन के आनन्द से सभी सांसारिक ताप मिट जाते हैं ।

सुख विलास मांहे नित वृन्दावन , रिषि महाविष्णु है जोए ।

वेद हमारो स्वसं है , तीरथ जमुना सोए ।।८१।। 

नित्य वृंदावन (अखण्ड योगमाया का स्थान) में अक्षरातीत धाम धनी ने कृष्ण तन में विराजमान होकर अपनी आत्माओं के साथ अलौकिक पवित्र रास लीला की थी, जो आज भी उसी प्रकार हो रही है । उस नित्य वृंदावन को ही सुख-विलास का स्थान माना गया है । महाविष्णु (आदि नारायण) ने सभी धर्मग्रन्थों में यह भविष्यवाणी लिखवाई कि २८वें कलयुग में स्वयं परब्रह्म अक्षरातीत इस धरती पर प्रकट होंगे । अतः उन्हें ऋषि माना गया है ।

धर्मग्रन्थों के सभी अनसुलझे रहस्यों को खोलकर अक्षरातीत पुरुषोत्तम की पहचान कराने वाला स्वसं वेद (श्री कुलजम स्वरूप, तारतम वाणी) ही हमारा वेद है । बेहद (अखण्ड योगमाया) से परे परमधाम में स्थित श्री यमुना जी को हम अपना तीर्थ मानते हैं । ज्ञातव्य है कि लौकिक जगत की प्रदूषित जड़ यमुना नदी के पूर्णतः विपरीत अखण्ड यमुना जी चेतन व सच्चिदानन्दमयी है ।

सास्त्र श्रवण श्री भागवत , बुद्ध जागृत को ज्ञान ।

कुल मूल हमारो आनन्द है , फल नित्य विहार प्रमान ।।८२।। 

सभी शास्त्रों का सार रूप श्रीमद्भागवत् को माना गया है क्योंकि इसमें अक्षरातीत के द्वारा श्री कृष्ण के तन में बैठकर खेली गई ब्रज की लीला तथा प्रतिबिम्ब की रास लीला का प्रमाण है । परन्तु श्रीमद्भागवत् सहित संसार के सभी ग्रन्थों का मूल स्वप्न की बुद्धि है । ब्रह्मसृष्टियां का ज्ञान जागृत बुद्धि की वाणी श्री कुलजम स्वरूप (तारतम वाणी) है जिसका ही वे अनुसरण करती हैं । यह अलौकिक वाणी निराकार व बेहद (योगमाया) से परे अनादि व अविनाशी परब्रह्म अक्षरातीत की पहचान कराती है । स्वयं अक्षरातीत उत्तमपुरुष द्वारा अवतरित यह ब्रह्मवाणी ही पूजनीय है ।

परब्रह्म की आत्माएँ अक्षरातीत के आनन्द अंग श्री श्यामा जी की अंग हैं । अतः ब्रह्मसृष्टियों के कुल का मूल आधार स्वयं श्री श्यामा जी हैं । यही आत्माएँ योगमाया से परे अखण्ड परमधाम में अक्षरातीत द्वारा नित्य की जाने वाली अत्यंत गुप्त अलौकिक प्रेम लीला का रसास्वादन करती हैं । यह वह लीला है जिसके बारे में स्वयं अक्षर ब्रह्म भी नहीं जानते थे । 

दिव्य ब्रह्मपुर धाम है , घर अक्षरातीत निवास ।

निजानन्द है सम्प्रदा , ए उत्तर प्रस्न प्रकास ।।८३।।

ब्रह्मसृष्टियों का धाम दिव्य ब्रह्मपुर (परमधाम) है, जो क्षर व अक्षर से परे स्थित है । उस परमधाम का कण-कण तेज, सुगन्धि, चेतनता और आनन्द से परिपूर्ण है । वही धाम अक्षरातीत व ब्रह्मसृष्टियों के मूल तनों (परआतम) का असल निवास है । यहां के कण-कण में अक्षरातीत का स्वरूप विराजमान होने से इसे स्वलीला अद्वैत कहा जाता है ।

जो सर्वज्ञ, सबको जानने वाला ब्रह्म है, जिसकी महिमा जगत में है, निश्चित रूप से वह ब्रह्म अमृतस्वरूप दिव्य ब्रह्मपुर में स्थित है । (मुण्डक. २/२/७-३९)

उपरोक्त पद्धति को मानने वाला समुदाय ही 'श्री निजानन्द सम्प्रदाय' कहलाता है । इस सम्प्रदाय का प्रवर्तन श्री देवचन्द्र जी के तन में विराजमान सच्चिदानन्द परब्रह्म की आह्लादिनी शक्ति श्री श्यामा जी ने किया है ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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