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श्री निजानन्द सम्प्रदाय की विशेषताएँ

इस ब्रह्माण्ड के आदि से चली आ रही शाश्वत सत्य ज्ञान की परम्परा का ही पूर्ण विकसित स्वरूप है श्री निजानन्द सम्प्रदाय । जब सदगुरु धनी श्री देवचन्द्र जी के तन में विराजमान होकर अक्षरातीत की आनन्द अंग श्री श्यामा जी ने इस क्षणभंगुर संसार में जागृत बुद्धि का ज्ञान प्रकट किया, तब से इस सत्य मार्ग का उद्घाटन हुआ ।

स्वप्न के समान नष्ट होने वाले इस जगत के प्राणी तो देवी-देवताओं, निराकार मण्डल अथवा आदि नारायण को ही परमात्मा मानकर हार गए । यदि कोई निराकार से आगे भी गया, तो केवल ब्रह्म को ही परब्रह्म मान लिया । अक्षर ब्रह्म के निज स्वरूप का बोध आज तक इस संसार में किसी को भी नहीं हो सका । परन्तु श्री निजानन्द सम्प्रदाय के द्वारा इस संसार को अ��्षर ब्रह्म से भी परे अक्षरातीत परब्रह्म के स्वरूप, धाम व लीला की वास्तविक पहचान हो सकी है ।  

मनुष्य योनि में ही ऐसी विवेकशील बुद्धि होती है जिसके द्वारा वह ग्रन्थों का अध्ययन करके परम सत्य को प्राप्त कर सकता है । परन्तु ब्रह्म की कृपा से अवतरित ज्ञान (वेद, क़ुरआन, आदि) में ऐसे गुह्य रहस्य छिपे होते हैं, जिन्हें इस मनुष्य बुद्धि (स्वाप्निक) से भी नहीं समझा जा सकता । ऐसी आंकड़ियों को खोलने की कुंजी तारतम ज्ञान (पराविद्या) है, जिसका अवतरण श्री निजानन्द सम्प्रदाय में हुआ है । तारतम ज्ञान (जागृत बुद्धि) के द्वारा ही सभी धर्मग्रन्थों का बातिनी (वास्तविक) अर्थ स्पष्ट हो सका है । इसके अतिरिक्त श्री प्राणनाथ जी (परब्रह्म अक्षरातीत) की कृपा से श्री कुलजम स्वरूप की वाणी में मारिफत (परम सत्य) का ऐसा ज्ञान प्रकट हुआ, जिसके विषय में स्वयं अक्षर ब्रह्म भी नहीं जानते थे ।

जीव को ८४ लाख योनियों के बाद आवागमन से छूटने के लिए मनुष्य तन प्राप्त होता है । परन्तु यह तो तभी सम्भव है जब उसे अपने मूल स्वरूप तथा धाम का पता हो । आज दिन तक सभी मानव, देवी-देवता तथा अवतार इस लक्ष्य को खोज-खोज कर हार गए, परन्तु कोई यह भी न जान सका कि मै कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ और मुझे जाना कहाँ है ? श्री निजानन्द सम्प्रदाय में अवतरित तारतम ज्ञान ने, न केवल इन सब उलझनों को सुलझा दिया, अपितु परमार्थ सिद्धि व अखण्ड मुक्ति का मार्ग भी दिखाया है । श्री मुख वाणी में वर्णित अद्भुत विहंगम मार्ग (चितवनि) के द्वारा सरलता से उन लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है, जिन्हें प्राप्त करने के लिए मनुष्यों ने कई जन्मों तक तथा देवी-देवताओं ने कई कल्पांतों तक कठोर तपस्या की परन्तु सफल न हो सके ।

वर्तमान समाज हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, आदि विभिन्न धर्मों में बँटा हुआ है । उनके धर्मग्रन्थ और भाषाएँ भी अलग-अलग हैं । परन्तु आज तक किसी भी अवतार, तीर्थंकर या पैगम्बर ने सब धर्मों का एकीकरण कर, उस अद्वैत परब्रह्म की पहचान नहीं कराई । श्री निजानन्द सम्प्रदाय ने सभी धर्मग्रन्थों में छिपे हुए समान सत्य सिद्धान्तों को प्रकट करके, उनके आधार पर एक परब्रह्म की पहचान कराई, जिसे ही सच्चिदानन्द परमात्मा, अल्लाह या Lord कहकर पुकारा जाता है ।

धर्म के अतिरिक्त मनुष्यों में जाति, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति, आदि के आधार पर भी भेद किया जाता है । श्री निजानन्द सम्प्रदाय में ऐसी हीन मानसिकता को कोई महत्व नहीं दिया जाता । अक्षरातीत की तारतम वाणी (श्री कुलजम स्वरूप) का अनुकरण करने वाले समुदाय को ही 'निजानन्द सम्प्रदाय' कहते हैं तथा प्रत्येक सदस्य को 'सुन्दरसाथ' कहा जाता है । आपस में सुन्दरसाथ 'प्रणाम' द्वारा एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं । जो प्रवचन सुनता है तथा जो सुनाता है (प्रचारक, गुरु, महाराज, आदि), दोनों में कुछ भी भेद नहीं माना जाता । ऐसी आदर्श व्यवस्था के द्वारा निजानन्द सम्प्रदाय ने विश्व को समानता, एकता, बन्धुत्व व शान्ति का संदेश दिया है ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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