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सिद्धपुर व मेड़ता में जाग���ी

श्री प्राणनाथ जी लगभग ५०० सुन्दरसाथ के साथ सूरत से सिद्धपुर आये । वहां २२ दिन के प्रवास के दौरान रेवादास उपाध्याय नामक पण्डे ने उनकी सेवा की । चलते समय उन्होंने उसे एक मोहर भेंट दी । रेवादास अधिक धन की मांग करने लगा तो गोवर्धन जी ने उससे कहा कि वह श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप में साक्षात् परब्रह्म को पहचाने ।

चलते समय श्री प्राणनाथ जी ने उसे यह ज्ञान दिया- "अष्टावरण युक्त १४ लोक, सात शून्य, आदि नारायण, निराकार और बेहद से परे स्वलीला अद्वैत अनन्त परमधाम है, जिसमें अक्षर ब्रह्म और अक्षरातीत का निवास है । परमधाम में प्रेम और आनन्द की रसधारा श्री यमुना जी बहती हैं, जिसके परे रंगमहल है, जिसकी प्रथम भूमि में मूल मिलावे में परब्रह्म का अति सुन्दर किशोर युगल स्वरूप विराजमान है । हमारे मूल तन वहीं पर हैं । वहां से बैठे-बैठे हमने सुरता द्वारा ब्रज-रास और जागनी का खेल देखा है । अब हम तारतम ज्ञान द्वारा जागृत होकर निजधाम जायेंगे ।"

रेवादास छः माह तक मौन रहकर इस कथन का पाठ करते रहे । एक दिन अचानक केशव भट्ट के सम्मुख उसने सब कुछ कह सुनाया । केशव भट्ट के अन्दर परमधाम की आत्मा विराजमान थी । परमधाम व धाम धनी अक्षरातीत की बात सुनकर वह तुरन्त, बिना घर पर किसी को सूचना दिये, श्री प्राणनाथ जी को ढूंढने चल पड़े । खोजते-खोजते आखिरकार दिल्ली पहुँचकर उन्हें श्री जी के दर्शन हुए । इस प्रकार यह सिद्ध होता परमधाम की आत्मा अक्षरातीत से मिलने के लिये व्याकुल रहती है तथा ब्रह्मज्ञान तारतम से संकेत मिलते ही उसे अपने आत्मिक स्वरूप की पहचान हो जाती है ।

सिद्धपुर से चलकर श्री प्राणनाथ जी व सभी सुन्दरसाथ मेड़ता पहुँचे । श्री जी ने ब्रह्मज्ञान की चर्चा प्रारम्भ की परन्तु कोई सुनने नहीं आया । उस नगर की जनता लाभानन्द यति नामक तान्त्रिक के भय से किसी अन्य महात्मा के पास नहीं जाते थे । यह जानकर श्री जी लाभानन्द यति के पास गये तथा उसे ज्ञान में परास्त किया । मूलतः तान्त्रिकों को अध्यात्म का कुछ भी ज्ञान नहीं होता । अपने झूठे मान की रक्षा के लिये लाभानन्द यति ने तन्त्र-मन्त्र द्वारा सुन्दरसाथ पर पत्थरों की वर्षा करने का प्रयास किया । जो क्रिया पहले भली प्रकार सम्पन्न होती थी, अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी के सामने उसकी आसुरी शक्ति से एक कंकरी भी नहीं उठी । आसुरी शक्तियां कितनी ही बलशाली क्यों न हो, अक्षरातीत व उनकी ब्रह्मात्माओं के सामने उनका कुछ भी बस नहीं चलता ।

यह पूरा प्रसंग सुनकर वहां के लोग श्री जी की चर्चा सुनने आने लगे तथा ब्रह्मज्ञान सुनकर उनके प्रति आकर्षित होने लगे । बहुत से लोग तारतम ग्रहण करके सुन्दरसाथ में सम्मिलित हो गये । इनमें श्री राजाराम, झांझन भाई तथा मकरन्द जी ने तो अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया । मेड़ता से लेकर पन्ना जी तक सभी सुन्दरसाथ की सम्पूर्ण सेवा का खर्च राजाराम तथा झांझन भाई ने उठाया ।

राजाराम की पुत्री ललिता का शरीर कुरूप व विकृत था । श्री जी ने कृपा करके थोड़ा जल उस पर छिड़क दिया जिससे वह तुरन्त सर्वांग सुन्दरी बन गई । जिस प्रकार अक्षरातीत ने श्री कृष्ण के तन में बैठकर कुबड़ी कुब्जा दासी को ठीक कर दिया था, उसी घटना को उन्होंने श्री मिहिरराज के तन में बैठकर दोहराया । ललिता के अन्दर परमधाम की आत्मा विराजमान थी और उसने अपना सम्पूर्ण जीवन श्री जी व सुन्दरसाथ की सेवा में समर्पित कर दिया ।

एक दिन श्री महामति जी ने मुल्ला के मुख से बांग सुनी- 'ला इलाह इल्लिलाह मुहम्मद रसूल अल्लाह' । यह सुनते ही श्री जी समझ गये कि जिसे हम क्षर, अक्षर और अक्षरातीत कहते हैं, उसे ही कलमें में 'ला इलाह इल्लिलाह' कहा गया है । दोनों में मात्र भाषा का अन्तर है । इसी समय श्री मिहिरराज के तन में अक्षर ब्रह्म की सुरता ने प्रवेश किया । इस प्रकार श्री इन्द्रावती जी की आत्मा में परब्रह्म की पांचों शक्तियां- जोश (ज़िबरील), श्यामा जी (रूह अल्लाह), अक्षर ब्रह्म (नूर जलाल), अक्षरातीत की आवेश शक्ति (अल्लाह तआला) तथा जागृत बुद्धि (इस्राफील) विराजमान हो गयीं । पांचों शक्तियों के आ जाने पर ही श्री इन्द्रावती जी की आत्मा को 'महामति' की शोभा प्राप्त हुई । महामति का तात्पर्य होता है- महानतम् बुद्धि का स्वामी ।

वेद पक्ष के ग्रन्थों में जो कुछ कहा गया है, कतेब परम्परा में भी वही बात दूसरे शब्दों में कही गयी है । मूल तत्व न समझकर संसार भाषा, वेशभूषा और कर्मकाण्ड में उलझा हुआ है । अतः श्री जी ने हिन्दू-मुस्लिम मतों के एकीकरण करने का दृढ़ संकल्प लिया । औरंगज़ेब को क़ुरआन के वास्तविक भेद प्रकट करके शरीयत से दूर करने के उद्देश्य से वे दिल्ली पहुँचे, किन्तु भेंट न होने के कारण वार्ता न हो सकी ।

 

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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