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ब्रह्मवाणी (तारतम)
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लाभ

अक्षरातीत का यह अलौकिक दिव्य ज्ञान अति दुर्लभ है । उसी प्रकार इसे पाने व हृदय में ग्रहण करने वाले को यह दुर्लभ परमार्थ सिद्धि का लाभ देता है अर्थात् इससे चित्त के सारे अच्छे-बुरे पूर्व संस्कार नष्ट हो जाते हैं, अच्छे-बुरे कर्मों के फल के बन्धन से मुक्ति, हृदय में जागृत बुद्धि के ज्ञान का प्रकाश, परब्रह्म अक्षरातीत का साक्षात्कार, क्षर ब्रह्माण्ड से परे योगमाया में अखण्ड मुक्ति, आदि प्राप्त होता है । श्री मुख वाणी का वास्तविक महत्व समझने वाला मनुष्य इसके लाभ कदापि नहीं गिन सकता क्योंकि वह अनन्त हैं ।

इन वानी की बरक���ें , सब दफे होत बलाएँ ।

सदा सैतान कांपत , मिने पैठ न सके ताए ।।  (बीतक ७१/३५)

इस ब्रह्मवाणी की बरकत (चिन्तन-मनन) से जीव के सभी संकट टल जाते हैं । परब्रह्म पर दृढ़ निष्ठा उत्पन्न होने से मनुष्य सुख-दुःख के प्रभाव से ऊपर उठ जाता है । इस संसार में एकमात्र यही ज्ञान भवसागर के मोह तथा अहंकार के आवरण को चीरकर अखण्ड धाम तक पहुँचाता है । इस कारण प्रकृति (माया) की शक्ति भी उस जीव के हृदय में विकार उत्पन्न नहीं कर पाती, जिसमें यह ज्ञान दृढ़ता से बस चुका हो ।                             

ए बैठत ढिग आए के , धरें सुनने को कान ।

होत पहिचान रूह की , बढ़त जात ईमान ।।    (बीतक ७१/१०)

जो भी श्रृद्धापूर्वक श्री कुलजम स्वरूप को सुनता तथा विचार करता है, उसे अपनी आत्मा के मूल स्वरूप, अक्षरातीत से अपने सम्बन्ध और अपने धाम (अखण्ड निवास) की पहचान हो जाती है। परब्रह्म के प्रति उस जीव की निष्ठा दृढ़ हो जाती है, जिससे प्रेम के मार्ग की भूमिका तैयार होती है ।

तिन नाबूद की नजर , बीच अखण्ड पहुंचे ।

अक्षर ठौर सरूप की , इन बानी से देखे ।।     (बीतक ७१/१६)

इस ब्रह्मज्ञान (तारतम वाणी) को गृहण करने से इस स्वप्न समान झूठे तन पर बैठे जीव की दृष्टि निराकार के मण्डल को पार करके अखण्ड योगमाया तक पहुँच जाती है । यह तथ्य विचारणीय है कि जिस बेहद धाम (योगमाया) को ढूंढते हुए सबने हार मान ली थी, इस वाणी की कृपा से सभी को उस बेहद से भी परे अक्षर ब्रह्म के निज स्वरूप तथा नूरमयी धाम (परमधाम) का बोध हो सका है ।

इन वाणी के सुनते , खुलत भिस्त के द्वार ।

आप देखे औरों दिखावहीं , पहुंचे नूर द्वार पार।।     (बीतक ७१/२१)

श्री प्राणनाथ जी के श्री मुख से अवतरित इस ज्ञान के सागर को श्रवण करने से सभी जीवों के लिए अखण्ड बहिश्त (मुक्ति स्थान) के द्वार खुल जाते हैं । इसके अतिरिक्त अक्षर ब्रह्म से भी परे परब्रह्म अक्षरातीत के निज स्वरूप, चरित्र व धाम का भी पता चलता है । यह दिव्य अवसर केवल कानों से सुनने (जानने) तक ही सीमित नहीं है, अपितु उस अलौकिक धाम व साक्षात् परमात्मा के दर्शन का भी सुन्दर लाभ लिया जा सकता है । श्री प्राणनाथ जी की कृपादृष्टि से ही उनके निज स्वरूप के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हो सका है ।

ए वानी इन धाम की , ले बैठावत निजधाम ।

सबको सुख उपजे , होए पूरन मनोरथ काम ।।     (बीतक ७१/११)

परमधाम की आत्माओं के लिए यह वाणी अत्यन्त सुखकारी तथा मन के सभी मनोरथ पूर्ण करने वाली है । इस वाणी को सुनते ही ब्रह्मसृष्टियों का मन इसके रस में डूबने लगता है । उन्हें धाम धनी की चर्चा के अतिरिक्त कुछ भी अच्छा नहीं लगता । तत्पश्चात् चितवनि के मार्ग का अनुसरण करके वे इस जड़ सृष्टि में ही अखण्ड व चेतन परमधाम का साक्षात्कार और परमानन्द प्राप्त कर लेती हैं । 

निष्कर्ष यही है कि श्री मुख वाणी के लाभ तो अनन्त हैं, परन्तु यह तो लेने वाली की पात्रता (अंकूर) व क्षमता (निष्ठा) पर निर्भर करता है कि वह इससे कितना लाभ ले पाता है । इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है कि वाणी को केवल पढ़ा ही न जाये, अपितु उसके एक-एक विचार पर गहन चिन्तन किया जाये तथा अन्ततः उसे रहनी में लाया जाये । एक बात तो सर्वमान्य है कि परमधाम का ज्ञान देने वाली अक्षरातीत की यह अलौकिक वाणी अति दुर्लभ है तथा जिसे भी इसे सुनने का अवसर प्राप्त हो, वह इस सुअवसर को कदापि न खोये ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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