Shri Prannath Gyanpeeth-     मासिक पत्रिका आर्थिक सेवा सम्पर्क करें
                                                                 




मुख्य संस्था अध्यात्म निजानन्द दर्शन विजयाभिनन्द बुद्ध ब्रह्मवाणी (तारतम) चितवनि महान व्यक्तित्व साहित्य प्रवचनमाला सुन्दरसाथ
कलियुग में प्रकटन
     परब्रह्म अक्षरातीत व उनकी आत्माओं का
     आनन्द अंग श्री श्यामा जी की लीला »
          श्री देवचन्द्र जी का जन्म 
          आध्यात्मिक खोज 
          कठोर साधना व निष्ठामय जीवन 
          श्री निजानन्द स्वामी के रूप में शोभा 
     श्री इन्द्रावती जी की लीला » 
          श्री मिहिरराज का जन्म 
          साधनामय जीवनारंभ  
          अक्षरातीत श्री प्राणनाथ के रूप में शोभा 
          जागनी अभियान 
          सूरत की बीतक 
          सिद्धपुर व मेड़ता में जागनी 
          विजयाभिनन्द बुद्ध के रूप में सुशोभित 
          औरंगज़ेब को जाग्रत करने का प्रयास 
          औरंगाबाद व रामनगर के प्रसंग 
          श्री पन्ना जी की बीतक 
 
 
 
  विजयाभिनन्द बुद्ध  »  कलियुग में प्रकटन  »  श्री इन्द्रावती जी की लीला  »  श्री मिहिरराज का जन्म

श्री मिहिरराज का जन्म

शान्तनु के भाई देवापि तथा इक्ष्वाकु वंशीय राजा मरु इस समय कलाप ग्राम में स्थित हैं । वे दोनो महान योगबल से युक्त हैं । परमात्मा की प्रेरणा से वे दोनो कलियुग में पहले की ही भांति धर्म की स्थापना करेंगे । (श्रीमद्भागवत् १२/२/३७,३८)

परमधाम की आत्मायें सुन्दरी और इन्दिरा (श्यामा जी और इन्द्रावती जी) जिन दो तनों में प्रकट होंगी, उनके नाम चन्द्र और सूर्य (देवचन्द्र और मिहिरराज) होंगे । तथा इनके अन्दर साक्षात् परब्रह्म विराजमान होकर लीला करेंगे, जिससे माया के अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश हो जाएगा । (पुराण संहिता ३१/५२-७० का सारांश)

उपरोक्त श्लोकों में वर्णित कलाप ग्राम (सिद्ध योगियों का गुप्त ग्राम) में निवास करने वाले इक्ष्वाकु वंशीय राजा मरु के जीव ने जामनगर राज्य के मंत्री (दीवान) श्री केशव ठाकुर व माता धनबाई के सुपुत्र श्री मिहिरराज के रूप में जन्म लिया । इनका जन्म सम्वत् १६७५ में भादो मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को हुआ था । श्री मिहिरराज के तन में परमधाम की आत्मा श्री इन्द्रावती (इन्दिरा) ने प्रवेश किया, जिन्हें बाद में 'महामति' की शोभा मिली तथा इनके धाम हृदय में विराजमान होकर परब्रह्म अक्षरातीत ने लीला की ।

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा