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श्री देवचन्द्र जी का जन्म

शान्तनु के भाई देवापि तथा इक्ष्वाकु वंशीय राजा मरु इस समय कलाप ग्राम में स्थित हैं । वे दोनो महान योगबल से युक्त हैं । परमात्मा की प्रेरणा से वे दोनो कलियुग में पहले की ही भांति धर्म की स्थापना करेंगे । (श्रीमद्भागवत् १२/२/३७,३८)

परमधाम की आत्मायें सुन्दरी और इन्दिरा (श्यामा जी और इन्द्रावती जी) जिन दो तनों में प्रकट होंगी, उनके नाम चन्द्र और सूर्य (देवचन्द्र और मिहिरराज) होंगे । तथा इनके अन्दर साक्षात् परब्रह्म विराजमान होकर लीला करेंगे, जिससे माया के अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश हो जाएगा । (पुराण संहिता ३१/५२-७० का सारांश)

उपरोक्त श्लोकों में वर्णित कलाप ग्राम (सिद्ध योगियों का ग्राम) में निवास करने वाले देवापि के जीव ने सम्वत् १६३८ में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मारवाड़ उमरकोट गांव में श्री देवचन्द्र जी के रूप में जन्म लिया । इनके पिता का नाम श्री मत्तु मेहता तथा माता का नाम श्री कुंवर बाई था । धर्मग्रन्थों के कथनानुसार परब्रह्म की आनन्द अंग श्री श्यामा जी (सुन्दरी) की आत्मा ने इनके तन में प्रवेश किया ।

जब श्री देवचन्द्र जी की आयु मात्र ११ वर्ष की थी, तभी से उनके मन में यह जानने की प्रबल जिज्ञासा उत्पन्न हो गई कि मै कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ तथा मेरी आत्मा का प्रियतम कौन है ? इन प्रश्नों का समाधान पाने के लिए उन्होंने बहुत प्रयास किया, किन्तु स्पष्ट उत्तर नहीं मिल पाया ।

उमरकोट गांव में उन्होंने एक मंदिर में स्थापित मूर्ति की प्रतिदिन तीन-तीन घण्टे परिक्रमा करनी प्रारम्भ कर दी, परन्तु जब कई वर्षों तक उससे कोई लाभ होता नहीं दिखा तो वे किसी अन्य मार्ग की खोज करने लगे ।

 

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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