Shri Prannath Gyanpeeth-     मासिक पत्रिका आर्थिक सेवा सम्पर्क करें
                                                                 




मुख्य संस्था अध्यात्म निजानन्द दर्शन विजयाभिनन्द बुद्ध ब्रह्मवाणी (तारतम) चितवनि महान व्यक्तित्व साहित्य प्रवचनमाला सुन्दरसाथ
कलियुग में प्रकटन
     परब्रह्म अक्षरातीत व उनकी आत्माओं का
     आनन्द अंग श्री श्यामा जी की लीला »
          श्री देवचन्द्र जी का जन्म 
          आध्यात्मिक खोज 
          कठोर साधना व निष्ठामय जीवन 
          श्री निजानन्द स्वामी के रूप में शोभा 
     श्री इन्द्रावती जी की लीला » 
          श्री मिहिरराज का जन्म 
          साधनामय जीवनारंभ  
          अक्षरातीत श्री प्राणनाथ के रूप में शोभा 
          जागनी अभियान 
          सूरत की बीतक 
          सिद्धपुर व मेड़ता में जागनी 
          विजयाभिनन्द बुद्ध के रूप में सुशोभित 
          औरंगज़ेब को जाग्रत करने का प्रयास 
          औरंगाबाद व रामनगर के प्रसंग 
          श्री पन्ना जी की बीतक 
 
 
 
  विजयाभिनन्द बुद्ध  »  कलियुग में प्रकटन  »  श्री इन्द्रावती जी की लीला  »  साधनामय जीवनारंभ

साधनामय जीवनारंभ

श्र��� मिहिरराज ने लगभग १२ वर्ष की आयु में सदगुरु श्री देवचन्द्र जी की शरण में आकर तारतम ग्रहण किया । श्री निजानन्द स्वामी (सदगुरु धनी श्री देवचन्द्र जी) ने उन्हें देखते ही पहचान लिया कि भविष्य में परब्रह्म की लीला इसी तन के द्वारा होगी ।

श्री देवचन्द्र जी की कृपा से मिले जागृत बुद्धि व परमधाम के ज्ञान से श्री मिहिरराज को आत्मिक दृष्टि प्राप्त हुई । वह अपना अधिक समय सदगुरु के संगति में बिताने लगे । सदगुरु धनी श्री देवचन्द्र जी की संगति से श्री मिहिरराज की प्रखर बुद्धि और निखर गई तथा आध्यात्मिक जिज्ञासा में तीव्र वृद्धि हुई ।

श्री मिहिरराज के भक्तिमय जीवन से उनके घर में विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई । उनके बड़े भाई उन्हें सदगुरु से उलग करना चाहते थे । पारिवारिक दबाव में उन्हें जामनगर में श्रीमद्भागवत् के सबसे बड़े विद्वान कान्ह जी भट्ट से वार्ता करने के लिए जाना पड़ा । परन्तु श्री मिहिरराज के पास तो तारतम ज्ञान की दृष्टि थी । भट्ट जी उनके प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सके तथा हारकर कहने लगे कि इन प्रश्नों का उत्तर तो ब्रह्माजी के पास भी नहीं है । इस प्रकार श्री मिहिरराज पहली विजय के साथ वापस अपने सदगुरु के सान्निध्य में आ गए ।

कुछ समय उपरान्त श्री मिहिरराज के मन में परमधाम के दर्शन की तीव्र इच्छा उत्पन्न हुई । इस कठिन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने अति कठोर साधना की । उनका शरीर जीर्ण-शीर्ण हो गया परन्तु उन्होंने तन की चिन्ता नहीं की । अन्ततः श्री मिहिरराज को परमधाम की झलक मिल ही गई । तदन्तर श्री निजानन्द स्वामी ने उन्हें सेवा कार्य हेतु अरब भेज दिया, जहां वे लगभग ५ वर्षों तक रहे । वापस आने पर कुछ कारणवश उन्हें श्री देवचन्द्र जी का सान्निध्य प्राप्त न हो सका ।

सम्वत् १७१२ में सदगुरु श्री देवचन्द्र जी का धामगमन (देहत्याग) हो गया । इसके पूर्व उन्होंने श्री मिहिरराज को बुलाकर भविष्य की सारी बातें बता दी कि भविष्य में जागनी लीला तुम्हारे तन से होगी । श्री देवचन्द्र जी के देहत्याग के पश्चात् श्री मिहिरराज ने धर्म प्रचार का उत्तरदायित्व संभाला ।

 

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा