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औरंगज़ेब को जागृत करने का प्रयास

उस समय लगभग सम्पूर्ण भारत पर औरंगज़ेब का शासन था । वह इस्लाम की ओट में जबरन धर्मांतरण करवाने पर तुला हुआ था । यद्यपि औरंगज़ेब क़ुरआन का बहुत बड़ा विद्वान था, फिर भी शरीयत के काज़ियों के दबाव में वह हिन्दुओं के प्रति बहुत अधिक घृणा का भाव रखता था ।

हरिद्वार से श्री प्राणनाथ जी पुनः दिल्ली आये । सुन्दरसाथ ने औरंगज़ेब को क़ियामत तथा इमाम मुहम्मद महदी साहिबुज़्ज़मां (अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी) के जाहिर होने का संदेश भिजवाने का अथक प्रयास किया, किन्तु बादशाह के अधिकारियों ने सभी प्रयासों को विफल कर दिया । अन्ततः बारह सुन्दरसाथ (लालदास, शेख बदल, भीमभाई, चिन्तामणि, खिमाईभाई, चंचलदास, नागजीभाई, सोमजीभाई, कायम मुल्ला, दयाराम, बनारसी, गंगाराम) मुस्लिम फकीरों के भेष में जामा मस्जिद में जाकर सनंध वाणी गाने लगे । जामा मस्जिद के शाही इमाम ने उनकी भेंट बादशाह औरंगज़ेब से करवा दी ।

इन सुन्दरसाथ ने बादशाह से क़ियामत के सातों निशान प्रकट होने एवं इमाम महदी के ज़ाहिर होने के सम्बन्ध में एकांत में बात करना चाहा । औरंगज़ेब स्वयं आंतरिक रूप से इमाम महदी से मिलने का इच्छुक था, किन्तु शरीयत के दबाव में वह एकांत में मिल नहीं सका । उसने अपने अधिकारियों को उनका सम्मानपूर्वक आतिथ्य करने को कहा।

बादशाह के काज़ी शेख इस्लाम के इशारे पर कोतवाल सीदी पौलाद ने उन १२ सुन्दरसाथ को बहुत यातनायें दी । यह मुस्लिम समाज का दुर्भाग्य है कि जिस ख़ुदा की वह बन्दगी करते हैं, उन्हें इस नासूत धरती (नश्वर जगत्) पर इमाम महदी के रूप में प्रकट होने पर वे पहचान न सके । जिनका सम्मान करना चाहिए था, उन्हीं रूहों (सुन्दरसाथ ब्रह्मआत्माओं) को उन्होंने कष्ट दिया । यह सुनकर श्री महामति जी ने इस ब्रह्माण्ड के महाप्रलय का मन बना लिया, किन्तु उनके हृदय में विराजमान अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी की प्रेरणा से जागनी लीला की अवधि और बढ़ा दी गई ।

काज़ी शेख इस्लाम ने बाद में अपनी भूल स्वीकार कर ली । उसने स्पष्ट कह दिया कि यद्यपि आपके द्वारा दी गई क़ुरआन की साक्षियों से हम यह स्वीकार करते हैं कि क़ियामत का समय आ गया है तथा इमाम महदी प्रकट हो गये हैं, किन्तु हम इसे अभी ज़ाहिर नहीं कर सकते क्योंकि ऐसा करने पर इस्लामी शरीयत का राज्य समाप्त हो जाएगा ।

इसी दौरान, क़ियामत के आने एवं आखरूल ज़मां इमाम महदी के प्रकट होने की साक्षी में मदीने की मस्जिद की दो मीनारें गिर पड़ीं तथा वहां से लिखित वसीयतनामें औरंगज़ेब बादशाह के पास आये । उन वसीयतनामों में लिखा था कि इमाम मुहम्मद महदी हिन्द में ज़ाहिर हो गये हैं तथा ज़िबरील फरिश्ता यहां से क़ुरआन (नूरी झण्डा) हिन्द में ले गया है ।

औरंगज़ेब इस डर से श्री प्राणनाथ जी के चरणों में नहीं आ सका क्योंकि ऐसा करने पर शरीयत के चाहने वाले मुसलमान उसे भी मरवा देते । मक्का-मदीना से आये वसीयतनामों तथा कालपी के मौलवियों के लिखे हुये महज़रनामा (स्वीकृति पत्र) से उसे विश्वास तो हो गया था कि इमाम महदी ज़ाहिर हो चुके हैं, किन्तु शरीयत और मृत्यु भय के आगे वह साहस नहीं कर सका । सुन्दरसाथ को दिये गए कष्ट के कारण औरंगज़ेब को लानत भी लगी तथा वह फिर कभी अपने सिंहासन पर नहीं बैठ सका । उसे अपने सिंहासन पर शेर बैठा दिखता था । अपने अन्तिम क्षणों तक उसे अपनी इस भूल का दुःख रहा । इसके अतिरिक्त मुगल साम्राज्य के पतन का रहस्य भी उसे समझ आ गया था । यह सब बातें उसने अपने पुत्र आज़म को अंतिम पत्र में लिखी थीं ।

इसके पश्चात् श्री जी ने औरंगज़ेब के अत्याचार का विरोध करने के लिये उदयपुर, औरंगाबाद, रामनगर आदि के राजाओं को जागृत करने का प्रयास किया, किन्तु परमधाम का अंकुर न होने के कारण कोई जागृत न हो सका ।

 

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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