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कलियुग में आत्माओं का प्रकटन

पुराण संहिता ग��रन्थ के अध्याय ३१ में शिव जी ने परब्रह्म की आत्माओं के पुनः संसार में प्रकटन का वर्णन किया हैं-

परमधाम की आत्माओं के अन्दर नश्वर जगत की दुःखमयी लीला को देखने के लिए, जो कभी भी इसके पहले उत्पन्न न होने वाली इच्छा थी, वह प्रियतम के साथ में रहने के कारण स्वभावतः पूरी नहीं हो सकी ।।२५।।

वह इच्छा उनके अन्दर बीज रूप से स्थित थी । सुख की वासना के लक्षणों से सम्बन्धित जीव ही संसार को प्राप्त हो सकते हैं । निश्चय ही जन्मजात संस्कार पूर्ण रूप से छूट नही पाते हैं । इसी प्रकार अक्षरातीत की प्रियायें भी खेल देखने की पहले वाली इच्छा से युक्त बनी रहीं । उसकी पूर्ति न होने से निजधाम में वे आत्माएँ जाग्रत न हो सकीं । इसके पश्चात् पहले की तरह ही वह कालमाया उत्पन्न हुई ।।२६-२८।।

अपनी इच्छा पूरी न होने के कारण अक्षरातीत की वे प्रियायें इस ब्रह्माण्ड में अवतरित होंगी । अपने परमधाम में कुछ समय तक सुषुप्त की तरह स्थित रहने के पश्चात् कालमाया के स्वप्न के ब्रह्माण्ड में पुनः अवतरित होंगी । वाराह नामक कल्प के दूसरे परार्द्ध में, स्वारोचिष आदि छः मन्वन्तरों के व्यतीत हो जाने पर सातवें वैवस्वत मन्वन्तर में अट्ठाइसवें कलयुग के प्रथम चरण में माया का खेल देखने की इच्छा शेष रह जाने के कारण वे असहनीय दुःख के भोग को प्राप्त होंगी ।।३०-३३।।

वे अलग-अलग देशों में तथा ब्राह्मण, आदि कुलों में भी पैदा होंगी । कुछ स्त्रियों का रूप धारण करेंगी तो कुछ पुरुषों का ।।३४।।

'बृहद्सदाशिव संहिता' ग्रन्थ के श्रुति रहस्य अध्याय में वर्णन है-

परब्रह्म की आनन्द स्वरूपा जो सखियां ब्रज और वृन्दावन में स्थित थीं, वे कलियुग में पुनः प्रकट होंगी और जाग्रत होकर पुनः अपने उस धाम में जायेंगी ।।१७।।

चिदघन स्वरूप परब्रह्म के आवेश से युक्त अक्षर ब्रह्म की बुद्धि अक्षरातीत की प्रियाओं को जागृत करने के लिए तथा सम्पूर्ण लोकों (१४ लोकों के ब्रह्माण्ड) को मुक्ति देने के लिए भारतवर्ष में प्रकट होगी । वह प्रियतम के द्वारा स्वामिनी (श्यामा जी) के हृदय में स्थापित किये जाने पर चारों ओर फैलेगी ।।१८-१९।।

भावार्थ- उपरोक्त वर्णनानुसार अक्षरातीत परमात्मा की शक्ति स्वामिनी श्री श्यामा जी (श्री देवचन्द्र जी) के हृदय में विराजमान हो गई । उस तन की लीला समाप्त होने पर युगल स्वरूप (परब्रह्म की शक्ति व स्वामिनी की आत्मा) श्री इन्द्रावती जी की आत्मा (श्री मिहिरराज जी का तन) के हृदय में विराजमान हो गये तथा इस नये तन से विजयाभिनन्द बुद्ध के रूप में सुशोभित हुए । इसी अलौकिक स्वरूप (अक्षरातीत परब्रह्म श्री प्राणनाथ जी) के प्रकटन के विषय में संसार के सभी प्रमुख धर्मग्रन्थों में विभिन्न भाषाओं में भविष्यवाणी की गई थी । उन्हें ही अक्षरातीत, विजयाभिनन्द बुद्ध, इमाम महदी, बसरी व हकी सूरत, अल्लाह तआला, The Lord, Second Christ, Supreme Truth God, आदि नामों से पुकारा गया है । अपनी आत्माओं के जीवों को इस नश्वर संसार की अज्ञानता से मुक्त करने के लिए परब्रह्म श्री प्राणनाथ जी ने परमधाम का अलौकिक ज्ञान तारतम वाणी श्री कुलजम स्वरूप (इलम-ए-लद्दुन्नी) प्रकट किया ।

इस प्रकार परब्रह्म की प्रियायें उस परम ज्ञान को प्राप्त करके जाग्रत होकर अपनी सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण कर लेंगी तथा परम आनन्द को प्राप्त होंगी ।।२०।।

हरिवंश पुराण भविष्य पर्व अध्याय ४ में कहा गया है कि कभी न होने वाले वे ब्रह्ममुनि कलियुग में अवतरित होंगे, जो एकमात्र प्रधान पुरुष (अक्षरातीत) के ही आश्रय में रहने वाले होंगे और उनको छोड़कर अन्य किसी की भी उपासना नहीं करेंगे ।

 

प��रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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