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पिपीलिका मार्ग

पिपीलिका का अर्थ होता चींटी । चींटी के समान धीरे-धीरे चलकर किसी मार्ग को पार करना ही पिपीलिका मार्ग का अनुसरण करना है ।

श्रवण कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनं । अर्चनं वन्दन दास्यं सख्यं आत्म निवेदन ।।                       अर्थात् नवधा भक्ति के सभी साधन यथा श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चन, पाद सेवन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्म निवेदन इस मार्ग के अन्तर्गत आते हैं ।

उपनिषदों का कथन है कि वह ब्रह्म मन तथा वाणी से परे है, अतः उसे इन्द्रियों, मन, वाणी तथा बुद्धि के साधनों से प्राप्त नहीं किया जा सकता । कठोपनिषद् ने तो स्पष्ट रूप से कहा है कि जब पाँचों इन्द्रियाँ मन सहित अपने कारण में लय हो जाते हैं तथा बुद्धि भी किसी प्रकार की क्रिया से रहित हो जाती है, तो उसे ही परमगति कहते हैं । ( कठो. २/६/���० )

इस कथन से तो यह निर्णय हो जाता है कि नवधा भक्ति के सभी साधन ब्रह्म का साक्षात्कार कराने में सक्षम नही हैं, क्योंकि ये शरीर, इन्द्रियों तथा मन, बुद्धि के धरातल पर किये जाते हैं । इस प्रकार की भक्ति केवल साकार रूप वाले देवी-देवताओं तक सीमित रहती है ।

आरती, पूजा, अर्चना, भोग, प्रार्थना, परिक्रमा, नाम जप, आदि कर्मकाण्ड इस मार्ग का प्रमुख अंश हैं । दुर्भाग्यवश बहुत से सुन्दरसाथ भी इसी मार्ग को अपने जीवन की इति समझ कर संतुष्ट हो गए हैं, जबकि अक्षरातीत के साक्षात्कार का लक्ष्य इससे बहुत दूर है ।

इस विषय पर श्री प्राणनाथ जी कहते हैं-                                         

रे  हूं  नाहीं  व्रत  दया  संझा  अगिन  कुंड ,  ना  हूं  जीव  जगन ।

तंत्र   न   मंत्र   भेख   न   पंथ ,       ना   हूं  तीरथ  तरपन ।। ( श्री मुख वाणी- किरन्तन ११/२ )

भिन्न-भिन्न प्रकार के व्रतों के पालन, प्राणियों पर दया, संध्या-हवन, जीव के द्वारा आत्मबोध होने से जो लोग ब्रह्म-प्राप्ति मानते हैं, मैं उनमें नहीं हूँ । विभिन्न प्रकार के तन्त्रों तथा मन्त्रों की साधना करने, अनेक प्रकार की वेशभूषा तथा सम्प्रदाय धारण करने, तीर्थों में वास करने एवं तर्पण आदि क्रियाओं से परब्रह्म प्राप्ति की आशा रखने वालों में मै नहीं हूँ ।

रे  हूं  नाहीं  नवधा  में  मुक्त  में  भी  नाहीं ,  न  हूं  आवा  गवन ।

वेद   कतेब   हिसाब   में   नाहीं ,      न   माहें   बाहेर   न  सुनं ।।  ( श्री मुख वाणी- कि. ११/६ )

जो लोग नवधा भक्ति में पारंगत हो जाने , चारों प्रकार की मुक्तियों को पाने तथा सृष्टि कल्याणार्थ मोक्ष से पुनः तन धारण करने को सर्वोपरि पद मानते हैं , मै उनमें नहीं हूँ । मेरा प्राणवल्लभ अक्षरातीत तो चारो वेदों तथा कतेब ग्रन्थों ( तौरेत, इंजील, जंबूर और कुरआन ) में वर्णित तथ्यों की सीमा , पिण्ड , ब्रह्माण्ड और शून्य-निराकार से भी परे है ।

सौ   माला   वाओ   गले   में ,       द्वादस  करो   दस   बेर ।

जोलों  प्रेम  न  उपजे  पिउ  सों ,  तोलों  मन  न  छोड़े  फेर ।।  (  श्री मुख वाणी- कि. १४/५ )

अपने गले में एक दो नहीं , बल्कि सौ मालायें डाल लो , केवल एक जगह ही नहीं , बल्कि १२ अंगों में १० बार तिलक लगा लो , लेकिन जब तक प्रियतम से प्रेम नहीं होता , तब तक यह मन माया में फँसना नहीं छोड़ेगा ।

अन्ततः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि पिपीलिका मार्ग अध्यात्म की अति प्रारम्भिक अवस्था है । केवल इसी मार्ग पर चलकर भवसागर की लम्बी दूरी पार नहीं की जा सकती । आगे बढ़ने के लिए कोई अन्य मार्ग चाहिए ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
   सर्वाधिकार सुरक्षित © श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ सरसावा