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सात दिन की लीला का सार

श्री प्राणनाथ जी ने किस प्रकार चार दिन तक गुप्त रूप से लीला की । पहले दो दिन उन्होंने श्री कृष्ण के तन में लीला की, जिसके फलस्वरूप लाखों लोग "कृष्ण-कृष्ण" जपते हुए आज भी उनके मधुर प्रेममय स्वरूप पर बलिहारी जाते हैं । उनके द्वारा भेजे गए सत् अंग श्री अक्षर ब्रह्म ने अरब में उनकी महिमा गाई और आज करोड़ों लोग इस्लाम की राह पर चल रहे हैं । उनकी कृपा से श्री श्यामा जी ने जामनगर में तारतम ज्ञान प्रकट किया । ज्ञान के अभाव व माया के प्रभाव के कारण लोग इन चारों लीलाओं के पीछे छिपे श्री प्राणनाथ जी के असली स्वरूप की पहचान नहीं कर पाये ।

अन्ततः श्री श्यामा जी के दूसरे तन (श्री मिहिरराज) में श्री इन्द्रावती जी के हृदय में विराजमान होकर सच्चिदानन्द श्री प्राणनाथ जी खुलकर पाँचवे दिन सारे संसार के सामने सम्वत् १७३५ में जाहेर हो गये । इस घड़ी की सभी अवतारों, महापुरुषों, ऋषि-मुनि, औलिया-फकीर को बहुत समय से प्रतीक्षा थी । वह स्वरूप जिसकी भविष्यवाणी सभी धर्मग्रन्थ कर रहे थे तथा जो अब तक गुप्त रूप से लीला कर रहे थे, अब स्पष्ट शब्दों में घोषित कर रहे हैं कि "मै ही अक्षरातीत, विजयाभिनन्द बुद्ध, पूर्णब्रह्म परमात्मा, इमाम मुहम्मद महदी, अल्लाह तआला, आखिरी मूसा हूँ" ।

पाँचवा दिन बीत जाने के बाद आज इस छठे दिन में भी सभी के लिए धाम धनी श्री प्राणनाथ जी (श्री राज जी) के दर्शन करने व लाभ लेने का सुअवसर उपलब्ध है । सभी परमहंसों ने इसका पूरा लाभ लिया है । अब हमे क्या करना चाहिए ? जो साक्षात् विराजमान है उसे लेवें या पूर्व लीलाओं में उलझे रहें ? जिस स्वरूप ने श्री कृष्ण के तन में बैठकर प्रेम की लीला की, क्या वह अपना प्रेममयी मधुर स्वभाव उसी शरीर में पीछे छोड़ आया है ? क्या प्रत्यक्ष विराजमान प्रेम, ज्ञान, कृपा व सौन्दर्य के सागर रूपी श्री प्राणनाथ जी के सुन्दर स्वरूप पर अपना सब कुछ समर्पित करना सुन्दरसाथ का प्रथम कर्तव्य नहीं है ? विचार करें ।

 

प्रस्तुतकर्ता- ज्ञानपीठ छात्र समूह  
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